नई दिल्ली: मकर संक्रांति हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है जोकि साल की शुरुआत में आता है. यह त्योहार हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है. मकर संक्रांति का संबंध मौसम की फसल, नई शुरुआत, सर्दियों के अंत और तेज धूप की वापसी से है.
भारत में लोग इस दिन नदियों में स्नान करते हैं, सूर्य देव की पूजा करते हैं, तिलकुट बांटते हैं, पतंग उड़ाते हैं और दही-चूरा खाते हैं. बिहार में खास तौर पर इस दिन दही चूरा खाने का रिवाज है. सभी परंपराओं में पतंग उड़ाना और दही-चूरा खाना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन मकर संक्रांति के दिन आखिर क्यों दही चूरा खाते हैं, इसके पीछे कई पारंपरिक महत्व है तो आईए जानते हैं.
अगर हिंदू धार्मिक मान्यताओं की मानें तो भगवान राम ने मकर संक्रांति के दिन पहली बार पतंग उड़ाना था. कथा के अनुसार उनकी पतंग इतनी ऊँची उड़ी कि वह इंद्रलोक तक पहुँच गई. तब से पतंग उड़ाना आनंद, भक्ति और सूर्य देव को सम्मान देने का प्रतीक बन गया.
इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं. मकर संक्रांति के समय सर्दी ढलने लगती है और सूर्य की रोशनी अधिक होती है. पतंग उड़ाने से लोग लंबे समय तक खुले में रहते हैं, जिससे शरीर को प्राकृतिक विटामिन डी मिलता है.
मकर संक्रांति के दिन दही-चूरा खाने का रिवाज है. खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में यह प्रचलित है. धार्मिक मान्यता के अनुसार दही-चूरा सूर्य देव का प्रिय प्रसाद है. इसे पूजा में अर्पित करने और फिर ग्रहण करने से सौभाग्य और समृद्धि आती है. इसे ग्रहों के दोषों को दूर करने में भी सहायक माना जाता है.
इन मान्यताओं के अलावा दही चूरा खाने का वैज्ञानिक महत्व भी है. दही में अच्छे बैक्टीरिया होते हैं जो पाचन को सुधारते हैं और पेट को ठंडक देते हैं. साथ ही दही-चूरा के कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं. चूरा लंबे समय तक पेट भरा रखने और शरीर को ऊर्जा देने में मदद करते हैं. यह हल्का और पौष्टिक भोजन है, जिसमें प्रोबायोटिक्स भी होते हैं.