नई दिल्ली: हिंदू धर्म में अलग-अलग देवी-देवताओं के हजारों मंदिर हैं, लेकिन बिहार में एक ऐसा मंदिर भी है जहां किसी भगवान या देवी की मूर्ति नहीं मिलती. यहां भाई-बहन के प्रेम और रिश्ते को सम्मान दिया जाता है. राखी के मौके पर इस मंदिर में बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचती हैं और अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना करती हैं. इस अनोखी परंपरा के पीछे एक पुरानी लोककथा भी जुड़ी हुई है.
यह अनोखा मंदिर बिहार के सिवान जिले के महाराजगंज प्रखंड के भीखाबांध गांव में स्थित है. इसे भैया-बहिनी मंदिर के नाम से जाना जाता है. मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है. यहां दो बरगद के पेड़ हैं, जो एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं कि उन्हें भाई-बहन के प्रतीक के तौर पर पूजा जाता है. रक्षा बंधन के दिन इस जगह पर खास रौनक रहती है. दूर-दूर से बहनें यहां पहुंचती हैं और बरगद के पेड़ों की पूजा कर अपने भाइयों की खुशहाली और लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं.
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह कहानी मुगल काल की है. कहा जाता है कि एक भाई अपनी बहन को उसके ससुराल से घर लेकर लौट रहा था. रास्ते में कुछ मुगल सैनिकों ने उन्हें रोक लिया. सैनिकों की नीयत खराब थी और उन्होंने बहन के साथ बदसलूकी करने की कोशिश की. अपनी बहन की रक्षा के लिए भाई अकेले ही सैनिकों से भिड़ गया. उसने पूरी ताकत से उनका सामना किया, लेकिन वह लंबे समय तक मुकाबला नहीं कर सका. इसके बाद बहन ने धरती माता से अपने सम्मान और रक्षा की गुहार लगाई. मान्यता है कि तभी जमीन फट गई और भाई-बहन उसी में समा गए.
लोककथा के मुताबिक, जिस स्थान पर दोनों धरती में समाए थे, वहीं बाद में दो बरगद के पेड़ उग आए. दोनों पेड़ एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं, जैसे भाई आज भी अपनी बहन की रक्षा कर रहा हो. इसी वजह से ग्रामीण इन पेड़ों को भाई-बहन का रूप मानकर पूजा करते हैं. मंदिर परिसर में मिट्टी का एक छोटा टीला भी है. राखी के दिन बहनें पहले यहां राखी अर्पित करती हैं और पूजा के बाद अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं. कई महिलाएं पेड़ों पर भी धागा बांधकर मन्नत मांगती हैं.
इस कहानी की ऐतिहासिक सच्चाई कितनी है, इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है. इसके बावजूद भैया-बहिनी मंदिर से लोगों की आस्था गहराई से जुड़ी हुई है. रक्षा बंधन से करीब दो दिन पहले यहां मेला शुरू हो जाता है और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. सिवान से महाराजगंज तक बस या ट्रेन से पहुंचा जा सकता है. इसके बाद महाराजगंज से भीखाबांध गांव जाने के लिए स्थानीय साधन मिलते हैं. गांव से मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो की सुविधा भी उपलब्ध रहती है.