नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर गहरा गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि फिलहाल उनकी सरकार की ईरान के साथ बातचीत करने में कोई रुचि नहीं है. ट्रंप का कहना है कि जब तक तेहरान गंभीर और सार्थक बातचीत के लिए तैयार नहीं होता, तब तक वॉशिंगटन किसी भी तरह की बैठक नहीं करेगा. इस बीच दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई भी लगातार तेज होती जा रही है.
व्हाइट हाउस में लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन के साथ मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी बैक-चैनल के जरिए अमेरिका से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा हालात में अमेरिका बातचीत के लिए तैयार नहीं है.
ट्रंप ने कहा कि ईरान बातचीत के लिए बेहद उत्सुक है, लेकिन जब तक वह गंभीर रुख नहीं अपनाता, तब तक अमेरिका की उनसे मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं है. उन्होंने दावा किया कि ईरान मौजूदा संघर्ष में लगातार कमजोर पड़ रहा है.
दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा कि देश के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के साथ उनका समन्वय पहले से अधिक मजबूत हुआ है. उन्होंने कहा कि सरकार के सभी महत्वपूर्ण फैसले सर्वोच्च नेता के निर्देशों के अनुसार लिए जा रहे हैं और देश इसी दिशा में मजबूती के साथ आगे बढ़ेगा.
तनाव के बीच अमेरिकी सेना ने लगातार 11वीं रात ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले किए. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों के लिए खतरे को कम करना है.
CENTCOM forces began striking military targets in Iran at 7 p.m. ET today for the 11th consecutive night. The strikes are designed to continue degrading Iran's ability to threaten commercial shipping in the Strait of Hormuz.
— U.S. Central Command (@CENTCOM) July 21, 2026
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य इस संघर्ष का सबसे अहम केंद्र बन सकता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से की ऊर्जा आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है.
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कांग्रेस को बताया कि ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर अब तक अमेरिका करीब 37.5 अरब डॉलर खर्च कर चुका है. उन्होंने कहा कि सेना के संचालन और भविष्य की तैयारियों के लिए अतिरिक्त 67 अरब डॉलर की जरूरत है. उनके अनुसार यह राशि राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य क्षमता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है.
फिलहाल दोनों देशों के बीच न तो सैन्य कार्रवाई थमती दिखाई दे रही है और न ही कूटनीतिक बातचीत की कोई ठोस संभावना नजर आ रही है. ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ता यह संकट वैश्विक सुरक्षा और ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.