नई दिल्ली: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है और उसे 21 दिनों की फरलो मंजूर हुई है. बता दें, अगस्त 2026 तक वह 2020 के बाद कुल 17 बार पैरोल या फरलो के जरिए जेल से बाहर आ चुका है. बार-बार मिलने वाली इस अस्थायी रिहाई को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि पैरोल और फरलो में आखिर अंतर क्या है और इन दोनों के तहत कैदी को छुट्टी कैसे मिलती है.
पैरोल ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी सजायाफ्ता कैदी को सजा पूरी होने से पहले कुछ समय के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाती है. आम तौर पर इसके पीछे कोई विशेष परिस्थिति या मानवीय वजह हो सकती है. उदाहरण के तौर पर परिवार में किसी करीबी की बीमारी, मृत्यु या अन्य जरूरी काम के लिए पैरोल दी जा सकती है.
पैरोल के दौरान कैदी को कई निर्धारित शर्तों का पालन करना होता है. वहीं छुट्टी की अवधि खत्म होने के बाद उसे वापस जेल लौटना पड़ता है. हरियाणा में भी पैरोल से जुड़े नियम और पात्रता की शर्तें तय हैं. वता दें, आम तौर पर पैरोल पर बिताया गया समय सजा की अवधि में शामिल नहीं किया जाता.
फरलो भी जेल से मिलने वाली अस्थायी छुट्टी है, लेकिन इसका मकसद पैरोल से अलग होता है. लंबे समय की सजा काट रहे पात्र कैदियों को परिवार से संपर्क बनाए रखने और कुछ समय जेल से बाहर बिताने का अवसर देने के लिए फरलो का प्रावधान है. फरलो के लिए किसी विशेष आपात स्थिति का होना जरूरी नहीं होता. हालांकि, कैदी को संबंधित नियमों और शर्तों को पूरा करना पड़ता है. फरलो के दौरान जेल से बाहर बिताया गया समय सजा की अवधि में शामिल किया जाता है.
राम रहीम को 2017 में दो साध्वियों से दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी. अक्टूबर 2020 में पहली बार अस्थायी रिहाई मिलने के बाद से वह कई बार पैरोल और फरलो पर जेल से बाहर आ चुका है. अलग-अलग मौकों पर उसे 21 से 50 दिनों तक की छुट्टियां मिली हैं. वहीं उसकी कई रिहाइयां चुनावी समय के आसपास होने के कारण राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा में रही हैं. हालांकि, पैरोल या फरलो स्थायी रिहाई नहीं होती। हर बार सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी और तय नियमों का पालन जरूरी होता है.