बलूचिस्तान में खनन सौदे, क्या पाकिस्तानी सेना ट्रंप को फंसाने की कर रही है कोशिश?

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने कथित तौर पर बलूचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में दुर्लभ खनिजों और तेल की खुदाई के लिए अमेरिका को राजी करने हेतु ट्रम्प प्रशासन के साथ गुप्त बातचीत शुरू कर दी है.

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Balochistan: पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने कथित तौर पर बलूचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में दुर्लभ खनिजों और तेल की खुदाई के लिए अमेरिका को राजी करने हेतु ट्रम्प प्रशासन के साथ गुप्त बातचीत शुरू कर दी है. लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह समझौता न केवल स्थानीय आबादी में असंतोष को बढ़ावा देगा, बल्कि अमेरिका को एक बार फिर अस्थिर क्षेत्रीय संघर्षों में भी उलझा सकता है.

ट्रंप को लुभाने की रणनीति

टाइम्स ऑफ इजरायल की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि पाकिस्तान में दुर्लभ खनिज और तेल के विशाल भंडार मौजूद हैं. हालांकि, महत्वपूर्ण जानकारी को छुपाया जा रहा है कि बलूचिस्तान, वजीरिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में खनन कार्य अत्यंत जटिल और जोखिम भरा है. ये क्षेत्र न केवल स्थानीय विद्रोहियों बल्कि पाकिस्तानी सेना के लिए भी चुनौतीपूर्ण हैं. यहाँ तक कि चीन भी इन क्षेत्रों में अपनी परियोजनाओं को लेकर हार मान चुका है. 

अफगानिस्तान जैसी गलती?

भू-राजनीतिक विश्लेषक सर्जियो रेस्टेली ने चेतावनी दी है कि यदि ट्रंप इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो अमेरिका वही गलती दोहराएगा, जो उसने अफगानिस्तान में की थी. जो बाइडन ने दोहा समझौते के तहत इन क्षेत्रों को छोड़ने का फैसला किया था, लेकिन अब बलूचिस्तान में खनन की कोशिश अमेरिका को फिर से उसी अस्थिरता में धकेल सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि बलूचिस्तान लंबे समय से जातीय और राजनीतिक अशांति का गढ़ रहा है, और बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप ने स्थिति को और जटिल किया है.

चीन का अनुभव और स्थानीय असंतोष

चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) ने पहले ही बलूचिस्तान में स्थानीय असंतोष को बढ़ावा दिया है. यदि अब अमेरिका भी खनन परियोजनाओं में शामिल होता है, तो यह नाराजगी और हिंसक विरोध को और हवा दे सकता है. स्थानीय लोग पहले से ही विदेशी शक्तियों के संसाधन शोषण से त्रस्त हैं. 

18वां संशोधन और संसाधनों पर हक

पाकिस्तान में 18वें संशोधन के लागू होने के 15 साल बाद भी प्रांतों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण नहीं मिला है. खैबर पख्तूनख्वा में संगमरमर, रत्न, क्रोमाइट और कॉपर जैसे संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, फिर भी यह क्षेत्र गरीबी से जूझ रहा है.

बलूचिस्तान में सोना, कोयला, कॉपर और रेयर अर्थ तत्वों की भरमार है, लेकिन यह पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा प्रांत बना हुआ है. मुनाफा केंद्र सरकार के पास जाता है, जबकि स्थानीय लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहते हैं. 

अमेरिका की रुचि और संभावित खतरे

ट्रंप प्रशासन ने दुर्लभ खनिजों को राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता घोषित किया है और चीन पर निर्भरता कम करने के लिए पाकिस्तान को एक विकल्प के रूप में देख रहा है. दूसरी ओर, इस्लामाबाद विदेशी मुद्रा की तलाश में इस सौदे के लिए उत्सुक है. लेकिन इतिहास बताता है कि रेको डिक और सैंडक जैसे प्रोजेक्ट स्थानीय लोगों के लिए केवल विस्थापन, प्रदूषण और अशांति लाए हैं. 

दमन की आशंका

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परियोजनाएं विकास के बजाय दमन को बढ़ावा देंगी. गांवों को सैन्य घेराबंदी में तब्दील कर दिया जाएगा, असहमति को अपराध माना जाएगा, और रॉयल्टी को रोका जाएगा. परिणामस्वरूप, अमेरिका विरोधी भावनाएं और तेज होंगी.

क्योंकि स्थानीय लोग इसे अमेरिकी मिलीभगत के रूप में देखेंगे. पाकिस्तानी सेना और ट्रंप प्रशासन के बीच संभावित सौदा बलूचिस्तान में अशांति को और बढ़ा सकता है. यह न केवल स्थानीय लोगों के लिए हानिकारक होगा, बल्कि अमेरिका को एक बार फिर जटिल क्षेत्रीय संघर्ष में उलझा सकता है.