दिल्ली HC का बड़ा फैसला, लिव-इन जोड़ो को रिश्तेदार या समाज का कोई भी व्यक्ति नहीं दे सकता दखल

वयस्क नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।

Date Updated Last Updated : 20 August 2026, 05:33 PM IST
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Courtesy: Ai generated image

नई दिल्ली: वयस्क नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत का कहना है कि आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे बालिग जोड़ों का रिश्ता शादी के ही समान है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के तहत दो बालिगों को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने की पूरी आजादी है और इसमें उनके माता-पिता, रिश्तेदार या समाज का कोई भी व्यक्ति दखल नहीं दे सकता और न ही उनकी जान या स्वतंत्रता को खतरा पहुंचा सकता है। 

दखल का किसी को अधिकार नहीं

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने यह आदेश 13 अगस्त को एक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। 30 वर्ष के आसपास की उम्र के इस जोड़े को लड़की के परिवार से जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को तुरंत संरक्षण देने का निर्देश दिया। 

न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की कि समाज के नैतिक दबाव या पूर्वाग्रहों के नाम पर किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों को छीनना उसकी व्यक्तिगत पहचान और स्वतंत्रता का हनन है।

दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भले ही लिव-इन में रह रहे जोड़े कानूनी रूप से शादीशुदा न हों, लेकिन बालिग होने के नाते उनका एक साथ रहना विवाह के समान ही माना जाएगा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने मिसालों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि बिना औपचारिक विवाह के भी बालिगों को अपनी इच्छा से साथ रहने का असीमित अधिकार है। इस अधिकार को न केवल देश की सर्वोच्च अदालत ने मान्यता दी है, बल्कि भारतीय विधायिका ने भी 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' जैसे कानूनों के तहत इसे कानूनी संरक्षण प्रदान किया है।

पुलिस की लापरवाही पर कोर्ट का सख्त संदेश

याचिकाकर्ता जोड़े ने अदालत के समक्ष अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया था कि वे पिछले कुछ समय से एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं और जल्द ही शादी भी करने वाले हैं। हालांकि, लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते के सख्त खिलाफ हैं और लगातार हिंसक परिणाम भुगतने की धमकियां दे रहे हैं। पीड़ित जोड़े ने इस संबंध में स्थानीय थाना प्रभारी (SHO) को लिखित शिकायत भी दी थी, लेकिन पुलिस प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसके बाद उन्हें सुरक्षा के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि जब बात दो बालिगों की सुरक्षा की हो, तो पुलिस को बिना किसी देरी के कार्रवाई करनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भले ही लिव-इन में रह रहे जोड़े कानूनी रूप से शादीशुदा न हों, लेकिन बालिग होने के नाते उनका एक साथ रहना विवाह के समान ही माना जाएगा।

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