गुरुग्राम में चार साल की बच्ची से जुड़े एक गंभीर मामले ने न्याय व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह की कड़ी टिप्पणियां कीं, उससे यह साफ हो गया कि पीड़ित और उसके परिवार के साथ हुई प्रक्रिया को लेकर अदालत बेहद असंतुष्ट है. कोर्ट ने इसे न केवल असंवेदनशील बताया, बल्कि इसे पीड़िता के लिए 'दूसरी बार उत्पीड़न' जैसा करार दिया.
यह सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष हुई. मामला बच्ची के माता-पिता द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें गुरुग्राम पुलिस पर लापरवाही और निष्क्रियता के आरोप लगाए गए थे. अदालत ने पहले भी पुलिस और जिला न्यायपालिका से जवाब मांगा था.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई. मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि पुलिस पीड़िता के घर जाकर बयान क्यों नहीं ले सकती. उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों का व्यवहार यह दर्शाता है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.
अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि मामले को पॉक्सो कानून की धारा 6 से घटाकर धारा 10 में क्यों बदल दिया गया. धारा 6 में सख्त सजा का प्रावधान है, जबकि धारा 10 अपेक्षाकृत कम सजा देती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह का बदलाव बिना ठोस आधार के करना कानून की समझ पर सवाल उठाता है.
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को अपराध की गंभीरता की सही समझ नहीं है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता और कानून की जानकारी दोनों बेहद जरूरी हैं, जो इस मामले में दिखाई नहीं दी.
कोर्ट ने इस बात पर भी कड़ी नाराजगी जताई कि बच्ची से आरोपी की मौजूदगी में सवाल-जवाब किए गए. इसे अदालत ने अपमानजनक और मानसिक आघात बढ़ाने वाला बताया. साथ ही, हलफनामे में पीड़िता की पहचान उजागर करने को भी गंभीर गलती माना गया.
मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि हलफनामे में हर जगह बच्चे का नाम लिखा है. हम पूरे दिन यही सिखाते हैं कि पीड़ित की पहचान उजागर न करें. लेकिन यह कहना बेहद निंदनीय है.