सुप्रीम कोर्ट में FGM पर बहस तेज, वकील का दावा- 'यौन सुख बढ़ाने के लिए है प्रक्रिया'

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित 'फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन' (FGM) से जुड़ी सुनवाई के दौरान एक तीखी बहस देखने को मिली. 9 जजों वाली संविधान पीठ के सामने, वकीलों और जजों के बीच धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकारों और इस प्रथा से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी गंभीर सवालों पर जोररदार चर्चा हुई.

Date Updated Last Updated : 08 May 2026, 12:23 PM IST
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Courtesy: X ( @MIB_India) screen grab

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) पर सुनवाई के दौरान गुरुवार को तीखी बहस देखने को मिली. 9 जजों की संविधान पीठ के सामने इस संवेदनशील मुद्दे पर धार्मिक स्वतंत्रता, महिला अधिकार और स्वास्थ्य जैसे अहम पहलुओं को लेकर विस्तृत चर्चा हुई.

सुनवाई के दौरान वकीलों और जजों के बीच हुई मौखिक टिप्पणियों ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया. अदालत ने संकेत दिया कि यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे में धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के टकराव से जुड़ा हुआ है.

सबरीमाला केस के साथ जुड़ी FGM याचिकाएं

सुप्रीम कोर्ट ने FGM से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई को सबरीमाला मामले के साथ जोड़ दिया है. अदालत का मानना है कि दोनों मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े समान प्रश्न शामिल हैं.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा महिलाओं की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और स्वास्थ्य अधिकार का उल्लंघन करती है. वहीं इसका समर्थन करने वाले इसे धार्मिक परंपरा का हिस्सा बताते हैं.

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत में कहा कि यह प्रथा छोटी बच्चियों पर लागू की जाती है और इसका असर उनके जीवनभर पर पड़ता है.

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया शरीर में स्थायी बदलाव करती है, जिससे यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर गंभीर असर होता है.

लूथरा ने यह भी तर्क दिया कि कई परिवार सामाजिक दबाव और बहिष्कार के डर से इस प्रथा का पालन करते हैं, लेकिन इसे किसी भी स्थिति में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता.

जस्टिस बागची की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में स्वास्थ्य और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है.

उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था की सीमाओं के भीतर ही लागू होता है.

जस्टिस बागची ने कहा, "जहां तक महिलाओं के खतना (FGM) का सवाल है, हमें शायद दूसरे अधिकारों पर विचार करने की भी जरूरत न पड़े."

शरीर और स्वास्थ्य पर गंभीर असर का दावा

लूथरा ने अदालत को बताया कि इस प्रक्रिया में शरीर के संवेदनशील हिस्से को हटाया जाता है, जिससे हजारों तंत्रिका-सिरों को नुकसान पहुंचता है.

उन्होंने कहा कि इसका असर महिलाओं के शारीरिक, मानसिक और प्रजनन स्वास्थ्य पर लंबे समय तक रहता है और यह किसी भी तरह से सामान्य प्रक्रिया नहीं मानी जा सकती.

59 देशों में प्रतिबंध 

बहस के दौरान यह भी बताया गया कि दुनिया के 59 देशों ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया है. याचिकाकर्ताओं ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के खिलाफ बताया.

धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार

जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यह प्रथा नैतिकता के आधार पर भी सवालों के घेरे में आती है.

वहीं जस्टिस बागची ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि इस प्रथा का व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या इसका पालन सामाजिक दबाव में किया जाता है.

सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि इस प्रथा का ऐतिहासिक उद्देश्य महिलाओं की यौनिकता को नियंत्रित करना रहा है.

जस्टिस बागची ने कहा कि इस पहलू की गंभीरता से जांच की जरूरत है क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा है.

नाबालिगों की सहमति का मुद्दा

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह प्रथा नाबालिग बच्चियों पर लागू होती है, जो कानूनी रूप से सहमति देने में सक्षम नहीं होतीं.

इस पर अदालत ने कहा कि इस पहलू को गंभीरता से जांचा जाएगा कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा सकता है.

प्रतिवाद पक्ष का दावा

अधिवक्ता निजाम पाशा ने अदालत में कहा कि इस प्रथा को न मानने पर समुदाय से बहिष्कार नहीं किया जाता.

उन्होंने इसे धार्मिक परंपरा का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है और इसके कोई सामाजिक दुष्परिणाम नहीं होते.

FGM को 'विकृति नहीं प्रक्रिया' बताने पर बहस

अधिवक्ता निजाम पाशा ने अदालत में तर्क दिया कि FGM को किसी तरह की विकृति नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे पश्चिमी देशों में होने वाली हुडेक्टॉमी जैसी एक चिकित्सा प्रक्रिया के समान देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रथा का उद्देश्य महिलाओं के “यौन सुख (सेक्सुअल प्लेजर)” को बढ़ाना बताया जाता है.

इस दावे पर सवाल उठाते हुए जस्टिस अमानुल्लाह ने आश्चर्य जताया और कहा कि यह तर्क स्वयं में विरोधाभासी प्रतीत होता है. उन्होंने पाशा द्वारा इसे पुरुषों के खतना से जोड़ने पर भी कड़ी आपत्ति जताई और तथ्यों को स्पष्ट करने की सलाह दी.

कोर्ट में 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' पर सवाल

न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही इस प्रथा को न मानने पर सीधे तौर पर बहिष्कार न किया जाता हो, लेकिन यदि इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा माना जाता है, तो अदालत के लिए इसकी गहन संवैधानिक जांच आवश्यक है.

9 जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई

यह महत्वपूर्ण मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष सुना जा रहा है. इस पीठ में जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमानुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची शामिल हैं, जो इस संवेदनशील मुद्दे के संवैधानिक पहलुओं पर विचार कर रहे हैं.

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