भारत पर अल-नीनो का बड़ा खतरा, कमजोर बारिश से सूखा और बढ़ सकती है महंगाई

समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाने की घटना, जिसे अल-नीनो कहा जाता है, अब देश की खाद्य अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द बनती जा रही है।

Date Updated Last Updated : 21 August 2026, 12:06 PM IST
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Courtesy: AI generated

नई दिल्ली: घर की रसोई में हिसाब-किताब गड़बड़ाने लगा है। चीनी का डिब्बा पहले से जल्दी खाली हो रहा है और हरी सब्जियां खरीदते वक्त हाथ अपने-आप जेब की तरफ बार-बार जा रहा है। सवाल यही उठ रहा है कि आखिर यह अचानक महंगाई का सिलसिला शुरू कहां से हुआ। इसका जवाब भारत की सरहदों से हजारों किलोमीटर दूर, प्रशांत महासागर के भीतर छिपा है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाने की घटना, जिसे अल-नीनो कहा जाता है, अब देश की खाद्य अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। अगर इसका असर व्यापक स्तर पर देखने को मिला, तो फसलों की पैदावार पर सीधी चोट पड़ेगी, जिससे मंडियों और खुदरा दुकानों तक अनाज-सब्जी की सप्लाई सिकुड़ सकती है।

विकास दर पर भी टिकी नजर

इसी उठापटक के बीच अर्थव्यवस्था की चाल पर भी सवालिया निशान लग गया है। रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने आगाह किया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खाने-पीने की चीजों और ईंधन के दाम बढ़ने से आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है। 

एजेंसी के अनुमान के अनुसार जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6.8% रह सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 7.6% दर्ज हुई थी। खुदरा महंगाई भी बीते साल के मामूली 2% से उछलकर करीब 4.9% तक पहुंचने की आशंका है।

खेत से थाली तक बिगड़ता हिसाब

भारत में किसानों का बड़ा तबका आज भी सिंचाई के लिए मानसून की बारिश पर ही निर्भर रहता है, इसलिए अल-नीनो जैसी घटना यहां दोहरी मार बनकर सामने आती है। बारिश कम या असमान हुई तो पैदावार गिरती है, और पैदावार गिरते ही फसल कटाई के बाद की पूरी सप्लाई चेन डगमगाने लगती है। खरीद से लेकर भंडारण, ढुलाई और आखिर में दुकान तक पहुंचने की प्रक्रिया में हर कदम पर लागत बढ़ती चली जाती है। मुख्य फसलों की कमी होने पर सरकार को विदेशों से आयात का सहारा लेना पड़ता है, जिससे न सिर्फ इंपोर्ट बिल भारी होता है बल्कि आम उपभोक्ता सीधे तौर पर वैश्विक कीमतों के झटकों की चपेट में आ जाता है। इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत बताते हैं कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 85 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बना रहता है, तो व्यापार घाटे पर कुछ हद तक लगाम लग सकती है, हालांकि खाद्य महंगाई की मार इस राहत को बेअसर कर सकती है।

बुआई का आंकड़ा फिलहाल राहत भरा

फिर भी खेतों की तस्वीर अभी उतनी डरावनी नहीं है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्पष्ट किया कि इस बार खरीफ फसलों पर अल-नीनो का कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना कम ही नजर आती है। 14 अगस्त तक देशभर में करीब 1,016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई पूरी हो चुकी थी, जो सामान्य दायरे का लगभग 92% है और पिछले साल की तुलना में महज 2% कम। संवेदनशील जिलों की गिनती भी 262 से घटकर करीब 100 रह गई है।

दक्षिण और पूर्वी हिस्सों में सूखे के आसार

मगर देश के हर कोने में हालात एक जैसे नहीं हैं। मौसम विभाग के मुताबिक अगस्त के मध्य तक मानसून की औसत कमी 12% रही, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह आंकड़ा 26%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 19% और उत्तर-पश्चिम भारत में 11% तक पहुंच गया। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में पानी की किल्लत पहले से महसूस होने लगी है। जानकारों के अनुसार अल-नीनो का असर कभी एकसमान नहीं रहता, कहीं सूखे के हालात बनते हैं तो कहीं सामान्य बारिश भी हो जाती है, और यही असंतुलन आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों की दिशा तय करेगा।

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