नई दिल्ली: दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नौवीं कक्षा लंबे समय से छात्रों के लिए सबसे मुश्किल पड़ाव साबित होती रही है. हर साल इस कक्षा में हजारों छात्र फेल हो रहे हैं. जिसके बाद लोकलाज या हताशा में बड़ी संख्या में बच्चे हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ देते हैं. इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने एक योजना की शुरुआत की है. सरकार का सीधा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक बार की शैक्षणिक विफलता किसी भी बच्चे के स्कूल आने का अंत न बने.
पहचान, संवाद और आत्मविश्वास की वापसी
शिक्षा निदेशालय के नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, सभी सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल्स को ऐसे छात्रों की एक सूची तैयार करने के आदेश दिए गए हैं जो नौवीं कक्षा में एक से अधिक बार फेल हो चुके हैं या जिन्हें कंपार्टमेंट श्रेणी में रखा गया है.
खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटाने की कोशिश
इन छात्रों और उनके अभिभावकों को स्कूल बुलाकर व्यक्तिगत काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जाएंगे. बच्चों को डांटने के बजाय उनका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटाने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा.
अचानक बदलता है परीक्षा का पैटर्न
जमीनी स्तर पर काम करने वाले शिक्षकों का मानना है कि आठवीं कक्षा तक लागू रहने वाली 'नो-डिटेंशन' (फेल न करने की नीति) के बाद जब छात्र अचानक नौवीं कक्षा की औपचारिक और कठिन परीक्षाओं का सामना करते हैं, तो वे इस बदलाव को संभाल नहीं पाते. बुनियादी शिक्षा कमजोर होने के कारण परीक्षा का यह दबाव उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है. इसके अलावा पारिवारिक दबाव, वित्तीय संकट और फेल होने के बाद खुद को दूसरों से कमतर आंकने की हीनभावना बच्चों को स्कूल से दूर कर देती है.
NIOS बनेगा दूसरा विकल्प
जो छात्र किसी कारणवश नियमित रूप से स्कूल आने में असमर्थ हैं या पारंपरिक क्लासरूम के माहौल में सहज महसूस नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें शिक्षा विभाग द्वारा NIOS के माध्यम से पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा. यह शिक्षा प्रणाली छात्रों को अपनी गति से सीखने का अवसर देती है. जिससे वे 10वीं कक्षा पूरी करके दोबारा मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में सम्मानजनक वापसी कर सकते हैं.
काउंसलिंग से पूरी समस्या हल नहीं होगी
शिक्षा विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम की सराहना की है, लेकिन साथ ही यह भी आगाह किया है कि केवल काउंसलिंग से पूरी समस्या हल नहीं होगी. इसके लिए स्कूलों में शुरुआती कक्षाओं से ही पढ़ाई का आधार मजबूत करना होगा, कक्षाएं चलानी होंगी और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना होगा. असली कामयाबी सिर्फ बच्चे को स्कूल में रोक कर रखने में नहीं, बल्कि उसे गरिमा और ज्ञान के साथ आगे बढ़ाने में है.