पश्चिम एशिया में इजरायल और लेबनान के बीच का संघर्ष अब एक अत्यंत विनाशकारी स्तर पर पहुंच गया है. राजधानी बेरूत सहित लेबनान के विभिन्न इलाकों में हुई बमबारी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता की लहर पैदा कर दी है. इन हमलों में दर्जनों लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों घायल हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति और इजराइली प्रधानमंत्री की साझा नीतियों ने लेबनान को संघर्ष-विराम के वर्तमान दायरे से पूरी तरह बाहर रखा है, जिससे इस क्षेत्र की संप्रभुता और सुरक्षा पर बड़ा संकट गहरा गया है.
रिपोर्ट्स के अनुसार इजराइली सेना ने लेबनान के नागरिक क्षेत्रों पर हवाई हमला कर भारी तबाही मचाई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बमबारी की इस लहर में अब तक 89 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि 700 से अधिक लोग इस हमले में घायल हुए हैं. राजधानी बेरूत में मलबे के ढेर इजरायल के आक्रामक रुख को दर्शाते हैं. प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे लेबनान को किसी भी प्रकार के शांति समझौते या संघर्ष-विराम प्रक्रिया में शामिल नहीं करेंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी लेबनान के खिलाफ इजरायल की सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि दो सप्ताह के अस्थायी शांति समझौते में लेबनान शामिल नहीं है. ट्रंप का मानना है कि हिजबुल्लाह की मौजूदगी के कारण लेबनान को इस समझौते से बाहर रखना आवश्यक था. उन्होंने लेबनान पर हो रहे हमलों को केवल एक स्वतंत्र टकराव बताया है.
राजनीतिक टिप्पणीकार ओरी गोल्डबर्ग ने इस सैन्य हमले को एक पटाखों जैसा तमाशा करार दिया है. उनके अनुसार, इजरायल अपनी असीमित सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है. गोल्डबर्ग का मानना है कि ये हमले इजरायल की हताशा को दर्शाते हैं. वे तर्क देते हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध की स्थिति में नेतन्याहू अब अमेरिका के लिए एक रणनीतिक बोझ बन गए हैं. इसलिए, इजरायल अब लेबनान में आक्रामकता दिखाकर अपना नियंत्रण साबित करने की कोशिश कर रहा है.
ओरी गोल्डबर्ग के विश्लेषण के अनुसार, प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपना सारा राजनीतिक भविष्य ट्रंप के समर्थन पर टिका दिया था, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो पाए. इजराइली नेता अब यह दिखाने के लिए बेताब हैं कि क्षेत्र में शक्ति का संतुलन उन्हीं के हाथों में है. यही कारण है कि लेबनान, जो वर्षों से संप्रभुता के उल्लंघन का केंद्र रहा है, अब इजरायल के लिए अपनी आक्रामकता दिखाने का सबसे प्रमुख मैदान बन गया है. कूटनीतिक रूप से नेतन्याहू खुद को काफी अलग-थलग महसूस कर रहे हैं.