नई दिल्ली: हिमालय की गोद में बसे नेपाल पर कुदरत का कहर अचानक और बेहद बेरहम बनकर टूटा है। बिना किसी पूर्व चेतावनी या भारी बारिश के, अचानक आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने तीन जिलों में तबाही का ऐसा मंजर बिछाया, जिसने हाल के वर्षों की सबसे भयानक मानवीय त्रासदियों में से एक का रूप ले लिया है। नेपाली पुलिस और पीएमओ के आंकड़ों के अनुसार, इस तबाही में अब तक 157 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 750 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में नेपाल के आम नागरिकों के अलावा 391 विदेशी पर्यटक, 133 भारतीय नागरिक और 44 सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं। नेपाली समाचार पत्र 'द काठमांडू पोस्ट' के अनुसार, उफनती भोटे कोशी नदी और ल्हेंडे नदी के पानी ने इंसानों के साथ-साथ बस्तियों, पुलों और गाड़ियों को ताश के पत्तों की तरह बहा दिया।
बिना बारिश के अचानक आई मौत की लहर
बुधवार सुबह जब सीमावर्ती इलाकों में लोग व्यस्त थे, तभी अचानक नदी का जलस्तर विकराल रूप ले चुका था। इलाके में बारिश नहीं हो रही थी, इसलिए किसी भी स्तर पर खतरे का सायरन नहीं बजा और न ही लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का मौका मिला।
इन्फ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान
बाढ़ की विनाशलीला ने नेपाल की रीढ़ माने जाने वाले बुनियादी ढांचे को भी गहरा जख्म दिया है। शुरुआती आकलन के मुताबिक, देश की 9 जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाएं इस मलबे में समाकर पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र रहीं 9 बैंकों की शाखाएं पूरी तरह बह गई हैं।
इसके अलावा, यातायात के जीवन सूत्र माने जाने वाले 19 बड़े मोटर योग्य पुल और करीब 40 किलोमीटर लंबी सड़कें पूरी तरह कट चुकी हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों में राहत दल का पहुंचना भी मुश्किल हो रहा है।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
पड़ोसी देश पर आए इस बड़े संकट के बीच भारत ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाते हुए राहत और बचाव कार्यों की कमान संभाली है। भारतीय वायुसेना का विशेष C-130J विमान 10 टन आवश्यक मानवीय सहायता और मेडिकल राहत सामग्री लेकर काठमांडू पहुंच चुका है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी देते हुए कहा कि भारत इस कठिन घड़ी में नेपाल के साथ मुस्तैदी से खड़ा है। इस फ्लैश फ्लड का मुख्य कारण कोई मानसूनी बारिश नहीं, बल्कि उच्च हिमाच्छादित क्षेत्र में हुई एक गंभीर भौगोलिक घटना है। प्लैनेट लैब्स की सैटेलाइट तस्वीरों से प्राथमिक जानकारी मिली है कि नेपाल-चीन सीमा के करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में एक बड़ा बर्फीला भूस्खलन (आइस एंड रॉक एवलांच) हुआ। इस भूस्खलन से चट्टानों और बर्फ के बड़े हिस्से ने ल्हेंडे नदी का रास्ता रोक दिया, जिससे एक अस्थायी मलबे की झील (डैम) बन गई।