रणथंभौर का खूंखार बाघ उस्ताद, नूर के आगे बदल जाता था अंदाज; जानें जंगल के ‘पावर कपल’ की कहानी

रणथंभौर के मशहूर बाघ उस्ताद और बाघिन नूर की कहानी जंगल की दुनिया के अनोखे अध्यायों में शामिल है. ताकतवर उस्ताद से जुड़ी नूर की जिंदगी में प्रेम, जुदाई, संघर्ष और नई पीढ़ी की कहानी देखने को मिलती है.

Date Updated Last Updated : 19 August 2026, 05:34 PM IST
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Courtesy: AI Generated

रणथंभौर: जंगल में राज करने वाले बाघों की दुनिया में ताकत, इलाका और वर्चस्व सबसे अहम होता है. लेकिन रणथंभौर के मशहूर बाघ टी-24 उस्ताद की कहानी कुछ अलग थी. जिस बाघ के नाम से जंगल के दूसरे जानवर और बाघ भी दूरी बनाकर रखते थे, वही उस्ताद बाघिन नूर के साथ बेहद शांत नजर आता था. दोनों की जोड़ी रणथंभौर में लंबे समय तक चर्चा का विषय रही. उनकी कहानी में दबदबा, परिवार, संघर्ष और ऐसी जुदाई शामिल है, जिसने इस शाही जोड़ी की कहानी को हमेशा के लिए यादगार बना दिया. उस्ताद पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘टाइगर 24’ भी दर्शकों को उसकी जिंदगी से रूबरू कराती है और यह अमेजन प्राइम पर उपलब्ध है.

उस्ताद का जन्म साल 2005 में झुमरू यानी टी-20 और गायत्री यानी टी-22 के घर हुआ था. उसने बड़े होकर अपने पिता की तरह ही मजबूत और निडर बाघ के रूप में पहचान बनाई. रणथंभौर के जंगल में उसका इलाका इतना मजबूत था कि दूसरे बाघ उसके क्षेत्र में आने से बचते थे. करीब नौ साल तक उस्ताद का दबदबा बना रहा. यहां तक कि जब उसके भाई जालिम ने उसके इलाके को चुनौती देने की कोशिश की, तो उस्ताद ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. उसकी चाल और अंदाज में ऐसा आत्मविश्वास दिखाई देता था कि लोग उसे ‘राइजिंग स्टार’ कहने लगे.

उस्ताद की एक और खास बात थी कि वह इंसानों और सफारी वाहनों से ज्यादा नहीं घबराता था. कई बार वह सफारी जीपों के बीच से गुजरता हुआ दिखाई देता था. यही वजह थी कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक उसकी एक झलक देखने के लिए उत्साहित रहते थे.

नूर बनी उस्ताद की खास साथी

अब कहानी में आती है बाघिन नूर की. साल 2009 में रणथंभौर के सुल्तानपुर क्षेत्र में नूर का जन्म हुआ. उसकी मां ओल्ड सुल्तानपुर फीमेल यानी टी-14 और पिता टी-12 थे, जिन्हें घूड़ा मेल के नाम से भी जाना जाता था. बड़ी होने के बाद नूर ने अपनी मां से अलग होकर जोन 1, 2 और 6 के आसपास अपना इलाका बनाया. धीरे-धीरे उसने भी जंगल में अपनी मजबूत पहचान बना ली. साल 2011 के आसपास नूर और उस्ताद की जोड़ी चर्चा में आने लगी. उस्ताद जहां अपने इलाके का ताकतवर बाघ था, वहीं नूर भी अपने क्षेत्र में एक मजबूत बाघिन के रूप में जानी जाती थी. दोनों को अक्सर एक साथ देखा जाता था. उनकी जोड़ी रणथंभौर आने वाले पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बन गई.

नूर और उस्ताद के घर आया ‘सुल्तान’

उस्ताद और नूर की जोड़ी से एक नर शावक पैदा हुआ, जिसका नाम सुल्तान रखा गया. उसे टी-72 के नाम से भी जाना जाता है. अपने पिता की तरह सुल्तान भी मजबूत और निडर दिखाई देता था. उस दौर में रणथंभौर के इस परिवार को देखने की पर्यटकों में खास उत्सुकता रहती थी. जंगल में उस्ताद, नूर और उनके शावक की मौजूदगी ने उनकी कहानी को और खास बना दिया था. लेकिन यह दौर ज्यादा लंबे समय तक नहीं चला. उस्ताद पर इंसानों पर हमला करने और चार लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार होने के आरोप लगे. इसके बाद उसे आदमखोर घोषित किए जाने को लेकर देशभर में बहस शुरू हो गई. कुछ लोग उस्ताद के समर्थन में थे, जबकि दूसरे लोग उसे इंसानों के लिए खतरा मान रहे थे.

2015 में उस्ताद को भेजा गया उदयपुर

मामला अदालत तक पहुंचा और आखिरकार साल 2015 में उस्ताद को रणथंभौर से हटाकर उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क भेज दिया गया. उसके जंगल से चले जाने के बाद नूर और उसके परिवार की जिंदगी भी बदल गई. नूर को लंबे समय तक अपने साथी के साथ रहने की आदत थी. उस्ताद के जाने के बाद उसे अकेले अपने इलाके और शावकों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी. इसी बीच उसका बेटा सुल्तान भी अपनी अलग टेरिटरी की तलाश में निकल गया. इसके बाद उसका कोई पक्का पता नहीं चल सका.

उस्ताद की जगह आया औरंगजेब

उस्ताद के हटने के बाद उसके पुराने इलाके पर टी-57 यानी औरंगजेब का कब्जा हो गया. उस समय आशंका जताई जा रही थी कि बाघों के सामान्य व्यवहार के अनुसार नया नर बाघ पुराने नर की संतान को नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. औरंगजेब ने नूर के साथ रहना स्वीकार किया और उसके शावकों को भी नुकसान नहीं पहुंचाया. यह घटना वन्यजीव प्रेमियों के लिए काफी अलग और हैरान करने वाली थी. नूर को लेकर एक और दिलचस्प संघर्ष सामने आया. औरंगजेब के भाई टी-58 यानी रॉकी की भी नूर के इलाके में दिलचस्पी थी. दोनों नर बाघों के बीच संघर्ष हुआ और आखिरकार औरंगजेब ने अपने भाई को पीछे कर दिया. इसके बाद नूर और औरंगजेब की जोड़ी बनी रही.

नूर ने आगे बढ़ाई रणथंभौर की विरासत

समय के साथ नूर ने नूरी, सुल्ताना और दूसरे शावकों को जन्म दिया. इस तरह उसकी अगली पीढ़ियां रणथंभौर के जंगल में आगे बढ़ती रहीं. नूर की जिंदगी में कई बदलाव आए, लेकिन उसने अपने बच्चों के जरिए जंगल में अपनी विरासत बनाए रखी. औरंगजेब की साल 2022 में मौत हो गई. वहीं, अब नूर भी उम्रदराज हो चुकी है. इसके बावजूद उसने अपने जीवन के आखिरी दौर में भी शावकों को जन्म देकर रणथंभौर की बाघों वाली विरासत को आगे बढ़ाया. उस्ताद अब जंगल में नहीं है और उसकी कहानी भी बीते दौर का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन रणथंभौर के जंगलों में नूर, उस्ताद और उनकी संतानों की कहानी आज भी वन्यजीव प्रेमियों के बीच खास जगह रखती है. यह कहानी जंगल की दुनिया में बदलते रिश्तों, इलाके की लड़ाई और बाघों की अगली पीढ़ियों के आगे बढ़ने की एक यादगार दास्तान बन चुकी है.

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