केशव मौर्य के 'मदरसा आतंकवाद' बयान पर सियासी घमासान, मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का पलटवार

मदरसों को लेकर केशव प्रसाद मौर्य के दिए बयान ने सियासत गरमा दी है. मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने इस बयान पर करारा जवाब देते हुए इतिहास पढ़ने की सलाह दी है.

Date Updated Last Updated : 04 August 2026, 12:17 PM IST
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Courtesy: X @kpmaurya1

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के मदरसों को लेकर दिए गए बयान पर प्रदेश की सियासत गरमा गई है. मौर्य ने दावा किया कि भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में मौजूद मदरसे भी आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं. उनके इस बयान पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, वहीं बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने उन्हें इतिहास पढ़ने की सलाह दी है.

केशव प्रसाद मौर्य ने क्या कहा?

पत्रकारों से बातचीत में केशव प्रसाद मौर्य ने मदरसा शिक्षा को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि मदरसा चाहे भारत का हो, पाकिस्तान का हो या बांग्लादेश का, वह कथित तौर पर आतंकवाद को जन्म देता है. उनके इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया.

विपक्षी नेताओं ने मौर्य के बयान पर आपत्ति जताते हुए इसे समाज में विभाजन पैदा करने वाला बताया. उनका कहना है कि चुनावी माहौल के बीच इस तरह की टिप्पणियों से सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है.

मदरसा शिक्षा को लेकर पहले से बहस

मौर्य का बयान ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा से जुड़े नियमों और बदलावों को लेकर चर्चा चल रही है. ऐसे में उनके बयान ने इस मुद्दे को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

मदरसा शिक्षा को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच पहले भी अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद सामने आते रहे हैं. इस बयान के बाद भी इस विषय पर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है.

मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने दिया जवाब

बरेली के मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मौर्य के बयान पर पलटवार किया. उन्होंने कहा कि केशव प्रसाद मौर्य को भारत का इतिहास पढ़ना चाहिए. रजवी ने दावा किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में उलेमा ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया और कई लोगों ने अपनी जान भी गंवाई. उन्होंने कहा कि मदरसों से जुड़े लोगों ने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया है.

मौलाना ने यह भी कहा कि मदरसों को केवल आतंकवाद से जोड़कर देखना उचित नहीं है और उनके ऐतिहासिक योगदान को भी समझना चाहिए. इस बयान के बाद मदरसा शिक्षा और उसके स्वरूप को लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक बहस और तेज हो गई है.

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