मथुरा: ब्रज की होली की जब भी बात होती है तो सबसे पहले बरसाना की लट्ठमार होली का जिक्र होता है. रंग, उमंग और परंपरा के इस अनूठे उत्सव में जहां बरसाना की हुरियारिनें लाठियों से नंदगांव के हुरियारों का स्वागत करती हैं, वहीं इन प्रहारों से बचाव का सबसे मजबूत सहारा होती है – ढाल.
लट्ठमार होली में हुरियारों के लिए ढाल केवल एक औजार नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच है. लाठियों की बौछार के बीच यही ढाल उन्हें चोट लगने से बचाती है. खास बात यह है कि नंदगांव के हुरियारे अपनी ढाल तैयार करवाने के लिए बरसाना ही आते हैं. यहां के मेन बाजार में स्थित रमेश मिस्त्री की दुकान इस परंपरा की साक्षी है.
पूरे बरसाना में रमेश मिस्त्री इकलौते कारीगर हैं, जो लट्ठमार होली के लिए ढाल तैयार करते हैं. सामान्य दिनों में वह गैस चूल्हा, गीजर और हीटर जैसी घरेलू उपकरणों की मरम्मत करते हैं, लेकिन होली से करीब 45 दिन पहले उनका काम पूरी तरह बदल जाता है. इस दौरान वे नई ढाल बनाने और पुरानी ढालों की मरम्मत में जुट जाते हैं.
रमेश मिस्त्री आगे बताते हैं कि उनके परिवार में पिछले 70 वर्षों से यही काम होता आ रहा है. ढाल बनाने की बारीकियां, उसे मजबूत और संतुलित बनाने की तकनीक उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखी है. उनके अनुसार एक ढाल का वजन करीब 8 किलो होता है. ऐसे में इसे उठाकर लाठियों के वार झेलना आसान नहीं होता. शरीर से मजबूत और संतुलित व्यक्ति ही इसे ठीक तरह संभाल पाता है.
ढाल का आकार हुरियारे के शरीर के अनुसार तय किया जाता है. कुछ लोग बड़ी ढाल पसंद करते हैं ताकि ज्यादा सुरक्षा मिले, जबकि कुछ हल्की और मध्यम आकार की ढाल बनवाते हैं, जिससे तेजी से मूवमेंट किया जा सके. पहले एक ही प्रकार की ढाल बनती थी, जिसमें लेदर का इस्तेमाल होता था. समय के साथ मांग और डिजाइन में बदलाव आया है.
अब हुरियारे अलग-अलग तरह की ढालों की डिमांड करने लगे हैं. बाजार में “हवा ढाल” और “एलईडी लाइट ढाल” भी तैयार की जा रही हैं, जो देखने में आकर्षक होती हैं. हालांकि, रमेश मिस्त्री बताते हैं कि आज भी सबसे ज्यादा मांग सादी और मजबूत पारंपरिक ढाल की ही रहती है. हुरियारे दिखावे से ज्यादा मजबूती और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं.
बरसाना की लट्ठमार होली में ढाल केवल सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि परंपरा और विश्वास का प्रतीक भी है. हर साल जब नंदगांव के हुरियारे बरसाना पहुंचते हैं, तो उनकी ढालें इस ऐतिहासिक उत्सव की गरिमा को और भी बढ़ा देती हैं. रमेश मिस्त्री जैसे कारीगर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, जिनकी मेहनत के बिना लट्ठमार होली का रंग अधूरा रह जाए.
रिपोर्टर- प्रेम कौशिक