15 अगस्त 1947 की वो सुबह, जब दिल्ली की सड़कों पर उमड़ पड़ा था 10 लाख लोगों का सैलाब

15 अगस्त 1947 की सुबह भारत के इतिहास की सबसे खास सुबह थी. लाल किले पर तिरंगा देखने के लिए लाखों लोग दिल्ली में जुटे थे. आजादी की खुशी के बीच बंटवारे का दर्द भी लोगों के दिलों में था.

Date Updated Last Updated : 15 August 2026, 10:54 AM IST
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Courtesy: AI Generated

नई दिल्ली: आज हम आजादी के 80 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं. हर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है. स्कूल, कॉलेज, दफ्तर और घरों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है. हम आजादी के इस माहौल के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शायद ही कभी सोचते हैं कि 80 साल पहले इसी दिन का मतलब क्या था. आज हमें देश में कहीं आने-जाने, पढ़ने, काम करने, कारोबार करने और अपनी पसंद की जिंदगी जीने की आजादी है. लेकिन 15 अगस्त 1947 से पहले हालात बिल्कुल अलग थे.

आज हम अपने अधिकारों को सामान्य जीवन का हिस्सा मानते हैं. कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर नौकरी कर सकता है, कारोबार शुरू कर सकता है और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़कर जनता का प्रतिनिधि बन सकता है. तिरंगा हाथ में लेकर सड़क पर निकलना भी हमारे लिए सामान्य बात है. लेकिन आजादी की पहली सुबह देखने वाली पीढ़ी के लिए ये सब किसी सपने के सच होने जैसा था.

आजादी की पहली सुबह का अलग ही रंग था

15 अगस्त 1947 की सुबह दिल्ली में लाखों लोग आजादी का जश्न मनाने के लिए उमड़ पड़े थे. बहुत से लोगों के पास अपना तिरंगा तक नहीं था. उनके लिए लाल किले पर फहराता राष्ट्रीय ध्वज ही आजाद भारत की पहचान था. उसकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार कर रहे थे. उस समय तिरंगा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं था. वह उस आजादी का प्रतीक था, जिसका सपना देशवासियों ने वर्षों तक देखा था. अंग्रेजी शासन से मुक्ति के बाद पहली बार लोगों को महसूस हुआ कि देश अब किसी विदेशी सत्ता के आदेश पर नहीं चलेगा. वे अपने फैसले खुद ले सकेंगे और अपने भविष्य को अपनी इच्छा के अनुसार आकार दे सकेंगे.

आधी रात से शुरू हो गया था जश्न

लेखक राजेंद्र लाल हांडा ने अपनी किताब ‘दिल्ली में दस वर्ष’ में 1940 से 1950 के बीच दिल्ली में हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का विस्तार से वर्णन किया है. उन्होंने 14 और 15 अगस्त 1947 की रात को अपनी आंखों से देखे दृश्यों को भी दर्ज किया है. उनके मुताबिक, रात करीब दो बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू संविधान सभा से निकलकर वायसराय भवन की ओर गए. आजादी के उत्साह में लोगों की भीड़ उनके पीछे चल पड़ी. चारों तरफ इतना बड़ा जनसमूह था कि लोगों का आना-जाना तक समझना मुश्किल हो गया था.

कुछ समय बाद नेहरू वायसराय को साथ लेकर संविधान सभा भवन पहुंचे. उस वक्त वहां मौजूद लोगों का उत्साह चरम पर था. नेताओं के स्वागत में लगातार नारे लग रहे थे. सभा भवन से लेकर आसपास के मैदान और सड़कों तक हर जगह लोगों की भीड़ थी. हांडा ने लिखा कि दिल्ली ने पहले भी कई बड़े उत्सव देखे थे, लेकिन 14-15 अगस्त की रात जैसा दृश्य शायद ही कभी देखा गया था. आधी रात के समय ऐसा लग रहा था जैसे आजादी खुद धरती पर उतर आई हो.

लाल किले पर तिरंगे का इंतजार

रात का समारोह खत्म होने के बाद भी लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ. कुछ लोग घर लौट गए, जबकि कई लोग सड़कों, फुटपाथों और खुले मैदानों में ही सो गए. सुबह होते ही लोगों का ध्यान लाल किले की ओर था. 15 अगस्त की सुबह करीब आठ बजे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया. यह पल ऐतिहासिक था, क्योंकि उसी लाल किले पर अब तक ब्रिटिश शासन का झंडा दिखाई देता था. आजादी के पहले दिन वहां जमा भीड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अखबारों और सरकारी अनुमानों के अनुसार करीब 10 लाख लोग आसपास मौजूद थे. दिल्ली गेट से कश्मीरी गेट और जामा मस्जिद से लाल किले तक सड़कें लोगों से भरी थीं. भीड़ इतनी ज्यादा थी कि उसे हटने में कई घंटे लग गए. दोपहर तक राजधानी की प्रमुख सड़कों पर लोगों की भारी मौजूदगी बनी रही.

‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ ने बढ़ाया जोश

आजादी की उस रात राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ की धुन ने माहौल को और भावुक बना दिया था. लोगों ने ये गीत पहले भी सुने थे, लेकिन उस रात उनका अर्थ कुछ अलग महसूस हो रहा था. आजादी मिलने के बाद इन गीतों के शब्द लोगों को अपने संघर्ष और बलिदान की याद दिला रहे थे.

जब ‘जन गण मन’ बजा तो हजारों लोग भावुक हो उठे. लेकिन पंजाब और सिंध का जिक्र आते ही कई लोगों को देश के विभाजन की पीड़ा याद आ गई. एक तरफ आजादी की खुशी थी, तो दूसरी तरफ बंटवारे से पैदा हुआ दर्द और हिंसा भी लोगों के मन में मौजूद थी. यानी आजादी की पहली सुबह केवल उत्सव नहीं थी. उसमें खुशी, गर्व, उम्मीद और विभाजन का दुख—सब एक साथ शामिल थे.

शहरों से गांवों तक आजादी का जश्न

लेखक डोमिनिक लैपीयरे और लैरी कॉलिन्स ने अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में भी 14-15 अगस्त 1947 के माहौल का विस्तार से वर्णन किया है. उनके अनुसार, 14 अगस्त की सुबह से ही देश के कई शहरों और गांवों में उत्सव शुरू हो गया था. दिल्ली के लोग घरों से निकलकर शहर के प्रमुख स्थानों की ओर जाने लगे. कोई साइकिल से पहुंच रहा था तो कोई बस, कार, रिक्शा या तांगे से. कई लोग बैलगाड़ियों पर सवार होकर आए. शहर में हर तरफ गीत, नारे और बधाइयों की आवाज सुनाई दे रही थी. लोगों ने नए कपड़े पहने थे और बच्चे अपने माता-पिता के साथ इस ऐतिहासिक पल को देखने पहुंचे थे.

गांवों से आए कई लोगों को शुरुआत में समझ नहीं आ रहा था कि इतनी बड़ी भीड़ और उत्सव किस बात का है. उन्हें बताया जा रहा था कि अंग्रेज अब देश छोड़ रहे हैं और भारत आजाद हो गया है. लोगों के लिए यह खबर ही अपने आप में किसी उत्सव से कम नहीं थी.

आजादी का मतलब हर किसी के लिए अलग था

आजादी का अर्थ उस समय हर व्यक्ति अपनी स्थिति के हिसाब से समझ रहा था. गांवों से आए लोग अपने बच्चों को बता रहे थे कि अब अंग्रेजों का शासन खत्म हो गया है. कई लोगों को उम्मीद थी कि अब खेती बेहतर होगी, ज्यादा पशु होंगे और जीवन में मुश्किलें कम होंगी. किसी के लिए आजादी का मतलब अपने खेत पर अधिकार था, किसी के लिए सम्मान के साथ जीना और किसी के लिए बिना डर अपनी बात कह पाना. लोगों को भरोसा था कि विदेशी शासन खत्म होने के बाद उनके जीवन में बदलाव आएगा.

देश के दूसरे हिस्सों में भी इसी तरह का माहौल था. सरकारी कार्यालयों, सैनिक छावनियों और दूसरी प्रमुख जगहों से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लगाया जा रहा था. जहां कभी ब्रिटिश अधिकारियों की तस्वीरें और निशान दिखाई देते थे, वहां अब स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज अपनी जगह बना रहा था.

आजादी की पहली सुबह एक सपने जैसी थी

आज हमारे लिए तिरंगा फहराना और स्वतंत्रता दिवस मनाना जीवन का हिस्सा है. हम उस पीढ़ी से हैं जिसने जन्म से ही एक स्वतंत्र देश देखा है. हमें अपने अधिकारों के लिए विदेशी शासन से संघर्ष नहीं करना पड़ा. लेकिन 80 साल पहले की पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ कहीं ज्यादा गहरा था. उन्होंने ऐसा दौर देखा था, जब आम लोगों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता था. सम्मान और स्वाभिमान को सत्ता के बल पर कुचला जा सकता था और अपने देश में भी फैसले किसी दूसरे के हाथ में थे.

इसलिए 15 अगस्त 1947 की सुबह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी. वह करोड़ों भारतीयों के लिए लंबे संघर्ष के बाद मिली नई जिंदगी की शुरुआत थी. लाल किले पर लहराता तिरंगा उनके लिए उस सपने का प्रतीक था, जिसमें भारत अपने फैसले खुद लेगा. आज जब हम आजादी के 80 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, तब उस पहली सुबह को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तिरंगे की असली कीमत वही पीढ़ी जानती थी जिसने उसे पहली बार आजाद भारत की धरती पर खुले आसमान के नीचे लहराते देखा था.

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