लिव-इन पर इलाहाबाद HC का दोहरा फैसला! तलाक के बिना साथ रहना गलत या सही? कोर्ट का बड़ा ट्विस्ट

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून और नैतिकता के बीच एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. इस बहस को अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हवा दी है. हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग फैसले दिए हैं.

Date Updated Last Updated : 29 March 2026, 12:03 PM IST
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नई दिल्ली: लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून और नैतिकता के बीच एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. इस बहस को अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हवा दी है. हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो अलग-अलग फैसलों ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अलग पॉइंट ऑफ व्यू पेश किया है, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च के महीने में दिए गए दो फैसलों में इस विषय पर भिन्न राय रखी. एकल पीठ ने जहां विवाहित व्यक्ति के बिना तलाक लिए लिव-इन में रहने को स्वीकार नहीं किया, वहीं खंडपीठ ने इसे आपराधिक अपराध मानने से इनकार  कर दिया है.

एकल पीठ का रुख: वैवाहिक अधिकार प्राथमिक

20 मार्च को आए फैसले में न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि कोई भी विवाहित व्यक्ति अपने पार्टनर से तलाक लिए बिना किसी अन्य के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता. अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है और यह दूसरे व्यक्ति के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती.

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सुरक्षा देने के लिए संवैधानिक अधिकारों का उपयोग नहीं किया जा सकता, हालांकि किसी खतरे की स्थिति में पुलिस से मदद ली जा सकती है.

खंडपीठ ने लिव-इन को दी मंजूरी

इसके विपरीत, मार्च के अंत में न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन में रहता है, तो इसे कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता.

अदालत ने जोर देकर कहा कि सामाजिक नैतिकता और कानूनी स्थिति अलग-अलग हैं, और यदि कानून में कोई अपराध परिभाषित नहीं है, तो केवल नैतिक आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.

सुरक्षा का अधिकार बना अहम मुद्दा

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं और उन्हें खतरा है, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है. अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हुए दंपति की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा और परिवार के हस्तक्षेप पर रोक लगाई.

बढ़ती बहस और कानूनी जटिलता

इन दो फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप, खासकर विवाह के बाद, एक जटिल कानूनी और सामाजिक विषय बना हुआ है. जहां एक ओर वैवाहिक अधिकारों की रक्षा की बात है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

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