नई दिल्ली: 7 नवंबर 1875 को कार्तिक शुक्ल नवमी यानी अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित 'वंदे मातरम्' के 150 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस ऐतिहासिक मील के पत्थर पर प्रधानमंत्री के उस विचार का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि 'वंदे मातरम्' भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का केवल एक प्रतीक भर नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना का अमूल्य मंत्र था। अथर्ववेद की प्राचीन मान्यताओं से प्रेरित इस कालजयी रचना में 'माता' केवल एक भौगोलिक भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि स्वयं सभ्यतागत शक्ति का प्रतीक है। स्त्री स्वरूप में शक्ति की इस परिकल्पना ने देशवासियों को एक ऐसे धागे में पिरोया जिसने स्वदेश प्रेम को एक पवित्र धर्म का दर्जा दिया।
स्वतंत्रता संग्राम की जीवनधारा और देशभक्ति का संचार
श्री अरबिंदो ने 'भवानी मंदिर' की परिकल्पना में मां को शक्ति के रूप में रेखांकित किया था, जिसे स्वामी विवेकानंद ने भारत माता के स्वरूप में देखा। 'वंदे मातरम्' ने देशवासियों के मन में देशभक्ति जगाई और बलिदानी भावना को जन्म दिया।
अगस्त 1905 में कोलकाता के टाउन हॉल में जब सैकड़ों भारतीयों ने एक स्वर में इसका उद्घोष किया, तब से यह क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों की ऊर्जा का मुख्य स्रोत बन गया। वर्ष 1906 में ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया जाना ही इसकी असीम शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण था।
आपत्तियां और राजनीतिक मोड़
वर्ष 1896 से कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों की शुरुआत पूरे वंदे मातरम् के गाने से होती थी। हालांकि, 1923 के काकीनाड़ा अधिवेशन में तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद स्थितियां बदलने लगीं। इन आपत्तियों के बावजूद जनता के बीच इसकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। अगस्त 1905 में कोलकाता के टाउन हॉल में जब सैकड़ों भारतीयों ने एक स्वर में इसका उद्घोष किया। 1906 में ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया जाना ही इसकी असीम शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण था। 1923 से पहले स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वजों के केंद्र में सुशोभित 'वंदे मातरम्' का बाद के वर्षों में गायब होना और 1937 में कांग्रेस अधिवेशनों के लिए इसे छह छंदों से घटाकर दो छंदों तक सीमित कर देना कई ऐतिहासिक प्रश्न खड़े करता है। 1937 में इस गीत का सीमांकन और 1947 में देश का विभाजन, ये दोनों घटनाएं इतिहास के पन्नों में गहरे मंथन की मांग करती हैं।
आधुनिक भारत की सांस्कृतिक नींव
ऋषि बंकिम ने कभी विश्वास व्यक्त किया था कि यदि उनकी अन्य सभी रचनाएं विलुप्त भी हो जाएं, तो भी 'वंदे मातरम्' अनंत काल तक अमर रहेगा। उनका यह विश्वास सत्य सिद्ध हुआ। भगिनी निवेदिता और मैडम भीकाजी कामा द्वारा परिकल्पित शुरुआती भारतीय ध्वजों के मध्य में इस मंत्र को स्थान मिला था। भारत की अवधारणा किसी आधुनिक संधि या घोषणा पर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक नींव पर टिकी है। 'वंदे मातरम्' जैसे साझा प्रतीक किसी भी तात्कालिक विवाद से परे हैं। स्वतंत्रता संग्राम की मुक्ति की मूल कुंजी बने इस अमर गीत का ऐतिहासिक मूल्यांकन आज भी प्रासंगिक है।