नई दिल्ली: एक दौर था जब हर वक्त किताबों में डूबे रहने वाले लोगों को पढ़ाकू या 'बोरिंग' मान लिया जाता था. लेकिन बदलती जीवनशैली और जनरेशन-जेड (Gen-Z) के दौर में किताबों की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है. अब किताबें केवल ज्ञान अर्जित करने या खाली समय बिताने का जरिया नहीं रहीं, बल्कि एक बड़े फैशन ट्रेंड और स्टेटस सिंबल के रूप में उभरकर सामने आई हैं. 'बुक-फैशन' के इस बढ़ते क्रेज ने किताबों को केवल हाथों तक सीमित न रखकर अंतरराष्ट्रीय लग्जरी ब्रांड्स के कपड़ों, बैग्स और एक्सेसरीज के डिजाइन तक पहुंचा दिया है.
फैशन की दुनिया में किताबों के इस बढ़ते आकर्षण को देखते हुए दुनिया के शीर्ष लग्जरी ब्रांड्स ने इसे अपने प्रोडक्ट्स में जगह दी है.
डिऑर (Dior): इस प्रीमियम ब्रांड ने अपने हैंडबैग्स को नया आकर्षण देने के लिए उन पर क्लासिक किताबों के कवर आर्ट प्रिंट करना शुरू किया है.
कोच (Coach): प्रसिद्ध पब्लिशिंग हाउस 'पेंगुइन' के साथ मिलकर इस ब्रांड ने बैग्स के लिए ऐसे छोटे-छोटे शोपीस तैयार किए हैं, जिनमें मौजूद सूक्ष्म किताबों के पन्नों को सचमुच पढ़ा भी जा सकता है.
शनेल और मियू मियू (Chanel & Miu Miu): ये दिग्गज ब्रांड्स केवल परिधान ही नहीं बना रहे, बल्कि अपने एक्सक्लूसिव 'बुक क्लब' और साहित्यिक गतिविधियों के जरिए युवाओं को ब्रांड से जोड़ रहे हैं.
मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, इस ट्रेंड के पीछे एक खास तरह की सामाजिक स्थिति छिपी है. आज के दौर में बढ़ती महंगाई के कारण युवाओं के लिए घर या अचल संपत्ति खरीदना एक बड़ी चुनौती बन गया है. ऐसे में अपनी बौद्धिक क्षमता और अलग पहचान को दुनिया के सामने पेश करने के लिए वे किताबों और उससे जुड़े लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स को एक माध्यम बना रहे हैं. पढ़ने का अभ्यास इंसान में संवेदनशीलता और विचारशीलता को विकसित करता है, इसलिए इस आदत का रुझान के रूप में सामने आना सकारात्मक माना जा रहा है.
'बुक-फैशन' का एक दूसरा पहलू यह भी है कि जब किताबें केवल घर सजाने, फोटो खिंचवाने या कपड़ों के साथ मैचिंग एक्सेसरी का हिस्सा बन जाती हैं, तो ध्यान उसकी मूल अध्ययन सामग्री से हट जाता है. घर में अलमारियों पर सजाकर रखी गई महंगी और दुर्लभ पुस्तकें अब यह दर्शाने का जरिया बन गई हैं कि व्यक्ति के पास उन्हें खरीदने का बजट और सजाने के लिए बड़ा स्थान उपलब्ध है. सोशल मीडिया पर इस ट्रेंड के हावी होने से कई बार यह गलतफहमी भी पैदा होती है कि किताब के अंदर क्या लिखा है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण पाठक का रूप-रंग और दिखावा है.
तमाम दिखावे और ट्रेंड्स के बावजूद, साहित्यिक जगत के जानकार मानते हैं कि छपे हुए शब्दों की ओर लौटना एक सुखद संकेत है. फैशन के बहाने ही सही, रोमांस, फैंटेसी और क्लासिक साहित्य की मांग में वृद्धि हुई है. इस ट्रेंड के जरिए डिजिटल स्क्रीन से दूर होकर प्रिंटेड पन्नों से जुड़ने वाले नए पाठकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है.