बीजिंग में ट्रंप का दम पड़ा फीका, चीन ने दुनिया को दिखाई अपनी असली ताकत

डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा ने साफ संकेत दिया कि वैश्विक राजनीति अब बहुध्रुवीय दौर की ओर बढ़ रही है और चीन अमेरिका के बराबर बड़ी शक्ति बनकर उभर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत भी बड़ी वैश्विक ताकत बन सकता है, इसलिए उसे अमेरिका और चीन के बीच संतुलित रणनीति अपनानी होगी.

Date Updated Last Updated : 16 May 2026, 05:37 PM IST
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Courtesy: Instagaram (CCTV Asia pacific

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दौरा उस दौर की ओर इशारा करता है जहां दुनिया अब सिर्फ अमेरिका केंद्रित नहीं रह जाएगी, बल्कि बहुध्रुवीय व्यवस्था तेजी से आकार ले रही है. इस यात्रा ने साफ कर दिया कि चीन अब केवल आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि अमेरिका के बराबर खड़ी वैश्विक शक्ति बन चुका है.

क्या मुद्दे लेकर चीन पहुंचे ट्रंप? 

ट्रंप चीन कई अहम मुद्दों को लेकर पहुंचे थे. इनमें व्यापार, तकनीक, ईरान संकट, होर्मुज स्ट्रेट और निवेश जैसे विषय शामिल थे. हालांकि यात्रा के बाद यह साफ दिखाई दिया कि अमेरिका अपनी अधिकांश प्राथमिकताओं पर चीन से मनचाहा समर्थन हासिल नहीं कर पाया. ट्रंप ने घरेलू राजनीति को ध्यान में रखते हुए यह दावा जरूर किया कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने जा रहा है, लेकिन चीनी पक्ष ने बेहद शांत तरीके से इस दावे को खारिज कर दिया. दूसरी ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे दौरे के दौरान संयमित और आत्मविश्वास से भरे नजर आए.

इस मुलाकात में सबसे ज्यादा चर्चा शी जिनपिंग द्वारा 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' के जिक्र की रही. यह सिद्धांत प्राचीन यूनानी इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स से जुड़ा है, जिसके अनुसार जब कोई नई शक्ति स्थापित महाशक्ति को चुनौती देती है तो संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है. शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया किसी तयशुदा संघर्ष की ओर बढ़ने के लिए बाध्य नहीं है. उनके इस बयान को चीन के बढ़ते आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

विशेषज्ञों का क्या मानना है? 

विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका का प्रभाव अचानक खत्म नहीं होने वाला. अमेरिका अभी भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय दृष्टि से दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीन ने जिस तेजी से आर्थिक और रणनीतिक विस्तार किया है, उसने वैश्विक संतुलन बदल दिया है. वहीं चीन भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है, जैसे धीमी होती अर्थव्यवस्था, घटती आबादी और सप्लाई चेन संकट.

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2050 तक चीन की आबादी घटने लगेगी, जबकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर उभर सकता है. यही वजह है कि आने वाले दशकों में भारत की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है. भारत के पास विशाल बाजार, युवा आबादी और रणनीतिक स्थिति जैसी बड़ी ताकतें हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलित रणनीति अपनानी होगी. एक ओर चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करना जरूरी है. वहीं, दूसरी ओर अमेरिका की बदलती नीतियों पर पूरी तरह निर्भर रहना भी जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाने, वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने और स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने का माना जा रहा है.

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दौरा उस दौर की ओर इशारा करता है जहां दुनिया अब सिर्फ अमेरिका केंद्रित नहीं रह जाएगी, बल्कि बहुध्रुवीय व्यवस्था तेजी से आकार ले रही है. इस यात्रा ने साफ कर दिया कि चीन अब केवल आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि अमेरिका के बराबर खड़ी वैश्विक शक्ति बन चुका है.

क्या मुद्दे लेकर चीन पहुंचे ट्रंप? 

ट्रंप चीन कई अहम मुद्दों को लेकर पहुंचे थे. इनमें व्यापार, तकनीक, ईरान संकट, होर्मुज स्ट्रेट और निवेश जैसे विषय शामिल थे. हालांकि यात्रा के बाद यह साफ दिखाई दिया कि अमेरिका अपनी अधिकांश प्राथमिकताओं पर चीन से मनचाहा समर्थन हासिल नहीं कर पाया. ट्रंप ने घरेलू राजनीति को ध्यान में रखते हुए यह दावा जरूर किया कि चीन 200 बोइंग विमान खरीदने जा रहा है, लेकिन चीनी पक्ष ने बेहद शांत तरीके से इस दावे को खारिज कर दिया. दूसरी ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे दौरे के दौरान संयमित और आत्मविश्वास से भरे नजर आए.

इस मुलाकात में सबसे ज्यादा चर्चा शी जिनपिंग द्वारा 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' के जिक्र की रही. यह सिद्धांत प्राचीन यूनानी इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स से जुड़ा है, जिसके अनुसार जब कोई नई शक्ति स्थापित महाशक्ति को चुनौती देती है तो संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है. शी जिनपिंग ने कहा कि दुनिया किसी तयशुदा संघर्ष की ओर बढ़ने के लिए बाध्य नहीं है. उनके इस बयान को चीन के बढ़ते आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

विशेषज्ञों का क्या मानना है? 

विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका का प्रभाव अचानक खत्म नहीं होने वाला. अमेरिका अभी भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय दृष्टि से दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीन ने जिस तेजी से आर्थिक और रणनीतिक विस्तार किया है, उसने वैश्विक संतुलन बदल दिया है. वहीं चीन भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है, जैसे धीमी होती अर्थव्यवस्था, घटती आबादी और सप्लाई चेन संकट.

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2050 तक चीन की आबादी घटने लगेगी, जबकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर उभर सकता है. यही वजह है कि आने वाले दशकों में भारत की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है. भारत के पास विशाल बाजार, युवा आबादी और रणनीतिक स्थिति जैसी बड़ी ताकतें हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलित रणनीति अपनानी होगी. एक ओर चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करना जरूरी है. वहीं, दूसरी ओर अमेरिका की बदलती नीतियों पर पूरी तरह निर्भर रहना भी जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाने, वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने और स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने का माना जा रहा है.

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