नई दिल्ली: पड़ोसी देश पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक ऐसा ऐतिहासिक स्थान है, जो न केवल अपनी अद्भुत वास्तुकला बल्कि गहरे धार्मिक और पौराणिक रहस्यों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. चटवाल जिले में स्थित 'कटासराज मंदिर' एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिससे एक बेहद चमत्कारी कुंड जुड़ा हुआ है. सनातन परंपरा में इस स्थान का विशेष महत्व है, और माना जाता है कि इस पवित्र कुंड का पानी कभी नहीं सूखता. कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और विभिन्न प्रशासनिक पाबंदियों के बावजूद, हर साल महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भारत सहित दुनिया भर से श्रद्धालु यहां महादेव की पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं.
सती के वियोग में उपजा 'कटाक्ष'
इस प्राचीन मंदिर और कुंड के निर्माण के पीछे एक बेहद भावुक पौराणिक कथा प्रचलित है. मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सती ने पिता दक्ष के यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था, तब उनके वियोग में भगवान शिव गहरे शोक में डूब गए. महादेव की आँखों से निकले आंसुओं की दो बूंदें धरती पर गिरीं. इनमें से एक बूंद राजस्थान के अजमेर स्थित पवित्र पुष्कर में गिरी और दूसरी बूंद पाकिस्तान के इस हिस्से में गिरी, जिससे 'कटास कुंड' का जन्म हुआ. संस्कृत के शब्द 'कटाक्ष' से ही इस जगह का नाम 'कटास' पड़ा, जिसका शाब्दिक अर्थ 'आंसुओं से भरी आंखें' होता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस कुंड में स्नान करने से मनुष्य के मन और आत्मा की शुद्धि होती है.
महाभारत काल से गहरा नाता
कटासराज सिर्फ शिव कथाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसका ऐतिहासिक संबंध महाभारत काल से भी है. कहा जाता है कि वनवास के दौरान पांडवों ने यहां लंबा समय बिताया था. यह वही स्थान है जहां धर्मराज युधिष्ठिर ने यक्ष के जटिल प्रश्नों के सही उत्तर देकर अपने चारों भाइयों के प्राण वापस पाए थे.
मंदिर का रहस्य
इतिहासकारों के मुताबिक, यह मंदिर परिसर 1000 साल से भी अधिक पुराना है. प्राचीन काल में यह स्थान ज्ञान, दर्शन और साधना का एक बड़ा केंद्र था. इसी क्षेत्र के पास स्थित नंदना किले में रहकर 11वीं सदी के महान मुस्लिम विद्वान अलबरूनी ने बिना किसी आधुनिक तकनीक के पृथ्वी की परिधि को मापने का सटीक फॉर्मूला खोजा था, जो आज के आधुनिक वैज्ञानिकों को भी हैरान करता है.
सांस्कृतिक संगम और वास्तुकला
कटासराज मंदिर की बनावट में हिंदू, बौद्ध और प्रारंभिक इस्लामी वास्तुकला का एक अनोखा मेल देखने को मिलता है, जो इस बात का गवाह है कि यहां सदियों तक विभिन्न संस्कृतियां एक साथ फली-फूली हैं. वर्तमान में, इस अनमोल ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर को सहेजने के लिए पाकिस्तान सरकार भी इसके संरक्षण के प्रयास कर रही है.