‘साड़ी शस्त्र’ में शिखा कारीगरी ने भालों के बीच साड़ी रखकर उठाया सवाल, शस्त्र क्या होता है?

साड़ी शस्त्र’ प्रदर्शनी में दर्शकों का सामना सबसे पहले किसी साड़ी से नहीं, बल्कि एक सवाल से हुआ। भाले, गदा और छुरियाँ, शक्ति की सबसे पुरानी और प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में से एक, और इनके ठीक बीच, लगभग अप्रत्याशित रूप से, टंगी थी कपड़े की एक साड़ी।

Date Updated Last Updated : 09 August 2026, 10:49 PM IST
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Courtesy: Saree Shastra Shikha Karigari

नई दिल्ली: साड़ी शस्त्र’ प्रदर्शनी में दर्शकों का सामना सबसे पहले किसी साड़ी से नहीं, बल्कि एक सवाल से हुआ। भाले, गदा और छुरियाँ, शक्ति की सबसे पुरानी और प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में से एक, और इनके ठीक बीच, लगभग अप्रत्याशित रूप से, टंगी थी कपड़े की एक साड़ी। नाज़ुक और सहज। यही विरोधाभास प्रदर्शनी का पहला सवाल सामने रखता है; क्या शस्त्र का अर्थ केवल धातु, धार और प्रहार से है? क्या वह शक्ति, जो काटती नहीं बल्कि अपनी उपस्थिति और निरंतरता के माध्यम से बनी रहती है, शस्त्र नहीं हो सकती? साड़ी विजय हासिल नहीं करती। वह टिकती है। वह कहानियों, स्मृतियों और परंपराओं को पीढ़ियों तक सँभालती है। प्रदर्शनी की आगे की यात्रा इसी विचार को अलग-अलग रूपों में सामने रखती है।

श्लोक में बसी स्त्री    

कुछ कदम आगे बढ़ते ही दृष्टि कपड़े की शक्ति से उस स्त्री की शक्ति की ओर चली जाती है, जो उसे पहनती है। एक संरचना के केंद्र में संस्कृत की पंक्ति अंकित थी:

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”

“जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।”

इसके चारों ओर प्रदर्शनी ने उन अनेक भूमिकाओं को सामने रखा, जिन्हें एक स्त्री एक साथ निभाती है। अधिवक्ता, कलाकार, राजनेता, गायिका, खिलाड़ी और उतनी ही सहजता से गृहिणी तथा देखभाल करने वाली। वह इन भूमिकाओं के बीच आती-जाती है, बिना किसी एक को पूरी तरह छोड़े।

यहीं आकर प्रदर्शनी के शीर्षक का अर्थ और स्पष्ट होता है। शस्त्र का सामान्य अर्थ ज्ञान, शक्ति या सामर्थ्य से जुड़ा है। ‘साड़ी शस्त्र’ इस अर्थ को विस्तार देता है। साड़ी भी शक्ति धारण करती है - बल के माध्यम से नहीं, बल्कि अपनी सुंदरता, गरिमा और उपस्थिति के माध्यम से। उसे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए स्वर ऊँचा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रदर्शनी का संदेश स्पष्ट है - गरिमा स्वयं में एक शक्ति है।

जब कैनवास पहना जा सके     

प्रदर्शनी में आगे बढ़ने पर साड़ी स्वयं एक कैनवास में बदलती दिखाई देती है। यहाँ दर्शकों ने पिचवाई, पट्टचित्र, गोंड, वारली, ऐपण और सोहराय जैसी भारत के विभिन्न अंचलों की पारंपरिक कला शैलियों को देखा। ये शैलियाँ समकालीन कला-अभिव्यक्तियों के साथ सहजता से प्रस्तुत की गई थीं।

हस्तचित्रित साड़ियों के साथ हथकरघा और कढ़ाई वाली साड़ियाँ भी प्रदर्शित की गईं, जिनमें देश के विभिन्न हिस्सों की GI-टैग प्राप्त बुनाइयाँ शामिल थीं।

यह अनुभव किसी कपड़ों की दुकान या रैक के सामने खड़े होने जैसा नहीं था। यह किसी कला दीर्घा में घूमने जैसा था - अंतर केवल इतना था कि दीवार पर प्रदर्शित हर कृति को तह करके पहना भी जा सकता था।

कपड़े के पीछे का हाथ     

प्रदर्शनी में कलाकारों को भी दर्शकों के सामने अपनी कला का अभ्यास करते हुए देखा जा सकता था।

एक कोने में राजस्थान के दो पिचवाई कलाकार दर्शकों के सामने कपड़े पर चित्र बनाते हुए इस कला की बारीकियाँ समझा रहे थे। दूसरे कोने में एक समकालीन कलाकार उकेरे हुए ठप्पों के साथ काम कर रहे थे और ऐसे पोस्टकार्ड तैयार कर रहे थे, जिन्हें दर्शक अपने साथ ले जा सकते थे।

एक कोना सदियों पुरानी कला-परंपरा की कहानी कह रहा था, तो दूसरा समकालीन हस्तचित्रण की भाषा में संवाद कर रहा था।

भूगोल और कलात्मक परंपराएँ भले ही इन्हें अलग करती हों, लेकिन एक विश्वास इन्हें जोड़ता था - विरासत तभी जीवित रहती है, जब उसका अभ्यास किया जाए, उसे साझा किया जाए और लोगों को उसे बनते हुए देखने का अवसर मिले।

यही बात ‘साड़ी शस्त्र’ को एक सामान्य वस्त्र प्रदर्शनी से अलग करती है। यहाँ दर्शक को केवल तैयार कृति नहीं दिखाई गई, बल्कि उसके पीछे काम करने वाले हाथ, कौशल और वर्षों के धैर्य को भी देखने का अवसर मिला।

वह किनारा, जो कभी नारा बन गया     

सौंदर्य से आगे बढ़ते हुए प्रदर्शनी इतिहास की ओर मुड़ती है - और उस अध्याय की ओर, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है।

साड़ी ने हमेशा रंग और अलंकरण से कहीं अधिक को अपने भीतर सँजोया है। उसने क्षेत्रीय पहचान, लोककथाओं, अनुष्ठानों तथा हथकरघा और शिल्प समुदायों के पीढ़ियों से संचित तकनीकी ज्ञान को संरक्षित किया है। क्यूरेटोरियल परिकल्पना के अनुसार, हर बुनाई एक अभिलेख है, हर बूटा एक भाषा और हर परिधान एक विरासत।

फिर औपनिवेशिक मिलों का दौर आया। ब्रिटिश निर्मित वस्त्रों की बाढ़ ने स्वदेशी बुनाई को गहरा नुकसान पहुँचाया। दाँव पर केवल आजीविका या उद्योग नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी था।

1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान कपड़ों ने इसका उत्तर दिया। बुने हुए किनारों और पल्लुओं पर शब्द और प्रतीक उभरने लगे, जिन्होंने हथकरघे को प्रतिरोध और राष्ट्रीय चेतना की एक मौन अभिव्यक्ति बना दिया। साड़ी ने, सचमुच, बोलना सीख लिया।

संवाद आगे बढ़ा    

प्रदर्शनी ने दर्शकों को केवल अतीत में नहीं छोड़ा। संवादों की श्रृंखला के माध्यम से इस विषय को वर्तमान से जोड़ा गया। इसी क्रम में “साड़ी: एक जीवंत सभ्यतागत विरासत - कला, धरोहर, पहचान और स्त्री-आख्यान” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई।

परिचर्चा में डॉ. कर्णसिंह; श्रीमती मुग्धा सिन्हा, आईएएस; श्रीमती बंदना प्रेयसी, आईएएस; श्रीमती रीता मेनन, पूर्व वस्त्र सचिव; डॉ. संजय कुमार मंजुल, अपर महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण; श्रीमती ज्योत्स्ना डी. नंदा, प्रमुख (संचार), डीएस ग्रुप; तथा डॉ. प्रोमिल पांडे, अधिष्ठाता, स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन, यूआईडी, जीडी गोयनका विश्वविद्यालय सहित अन्य गणमान्य वक्ताओं ने भाग लिया।

क्यूरेटर के साथ दीर्घा-भ्रमण, सजीव हस्तचित्रण प्रदर्शन तथा कलाकारों, शिल्पियों और विद्वानों के साथ खुली बातचीत ने उस परिकल्पना को पूरा किया, जिसके तहत यह स्थान केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि संवाद के लिए तैयार किया गया था।

वृत्त पूरा हुआ  

शिखा कारीगरी की संस्थापक शिखा अजमेरा के लिए यह प्रदर्शनी इसलिए विशेष रही, क्योंकि इसमें उत्पादों के बजाय रचनाकारों को कहानी के केंद्र में रखा गया।

“शिखा कारीगरी को अनेक मंचों पर अपना कार्य प्रस्तुत करने का अवसर मिला है; किंतु इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में यह प्रदर्शनी आयोजित करने का अवसर हमारे लिए विशेष महत्व रखता है। यह केवल ब्रांड को प्रस्तुत करने की बात नहीं है, बल्कि उन असंख्य कलाकारों, बुनकरों और शिल्पियों की मेहनत, कौशल तथा कारीगरी को नमन करने की भी बात है, जिनके योगदान ने भारत को वस्त्र-विरासत का वैश्विक केंद्र बनाया है।”

महिला-नेतृत्व वाला सामाजिक उद्यम तथा समकालीन कला एवं वस्त्र-प्रतिष्ठान शिखा कारीगरी भारत भर के 100 से अधिक कलाकारों और शिल्पियों के साथ कार्य करता है, जिसमें पट्टचित्र, पिछवाई, वारली, गोंड और सोहराय जैसी परंपराओं के साथ-साथ समकालीन अभिव्यक्ति भी सम्मिलित है। इसका कार्य इससे पूर्व भारतीय कला, वास्तुकला एवं डिज़ाइन द्विवार्षिकी, भारत टेक्स, सालारजंग संग्रहालय, इफ़्फ़ी तथा सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेले में प्रस्तुत हो चुका है। श्रीमती अजमेरा के लिए कपड़ा कैनवास भी है और अभिलेख भी - सांस्कृतिक आख्यान को हस्तचित्रण में ढालने का एक माध्यम।

Exhibition के दूसरे छोर तक पहुँचते-पहुँचते पहली संरचना का अर्थ चुपचाप बदल चुका था।

भाला, गदा और छुरी शक्ति की एक शब्दावली थे। साड़ी दूसरी। उसकी शक्ति अधिक मौन थी और देर से दिखाई देने वाली - बिना बोले कह देने की सामर्थ्य, बिना हाथ उठाए समूचे वातावरण को थाम लेने की क्षमता, तथा अपनी पहचान गँवाए बिना सौंदर्य और गरिमा को एक शताब्दी पार ले जाने का धैर्य। साड़ी शस्त्र का समापन 9 अगस्त 2026 को हुआ।

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