'न्यायिक अधिकारियों के लिए बनें माता-पिता, अहंकार छोड़ें', सुप्रीम कोर्ट की हाईकोर्ट को नसीहत

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को एक महिला न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ी नसीहत दी. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट्स को अपने न्यायिक अधिकारियों के प्रति माता-पिता की तरह संवेदनशील और सहयोगी रवैया अपनाना चाहिए, न कि अहंकारी दृष्टिकोण.

Date Updated Last Updated : 22 August 2025, 06:49 PM IST
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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को एक महिला न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ी नसीहत दी. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट्स को अपने न्यायिक अधिकारियों के प्रति माता-पिता की तरह संवेदनशील और सहयोगी रवैया अपनाना चाहिए, न कि अहंकारी दृष्टिकोण.

यह टिप्पणी एक सिंगल मदर और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की शिक्षा के लिए तबादले की मांग की थी.

बेटे की शिक्षा और मां की जिम्मेदारी

महिला जज, जो अनुसूचित जाति वर्ग से हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने तबादले और छह महीने के बाल देखभाल अवकाश की मांग की थी. उन्होंने बताया कि वह एक सिंगल मदर हैं और उनके बेटे की 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा अगले साल होने वाली है. इसके लिए उन्हें ऐसे जिले में स्थानांतरण की आवश्यकता है, जहां अच्छे सीबीएसई स्कूल उपलब्ध हों. याचिकाकर्ता ने हजारीबाग में सेवा जारी रखने या रांची अथवा बोकारो में तबादले की मांग की, क्योंकि उनका वर्तमान तबादला दुमका में किया गया है, जहां स्कूली सुविधाएं अपर्याप्त हैं.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, "हाईकोर्ट को अपने न्यायिक अधिकारियों के प्रति माता-पिता की तरह व्यवहार करना चाहिए. तबादले जैसे मुद्दों को अहंकार का सवाल नहीं बनाना चाहिए." कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को या तो बोकारो स्थानांतरित करे या मार्च-अप्रैल 2026 तक हजारीबाग में ही रहने दे, ताकि उनके बेटे की परीक्षाएं प्रभावित न हों.

बाल देखभाल अवकाश का मुद्दा

याचिकाकर्ता ने छह महीने के बाल देखभाल अवकाश की मांग की थी, जिसे हाईकोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था. बाद में उन्हें तीन महीने की छुट्टी दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने मई में झारखंड सरकार और हाईकोर्ट रजिस्ट्री से इस मामले में जवाब मांगा था. नियमों के अनुसार, एक एडीजे अपने कार्यकाल में 730 दिनों तक का बाल देखभाल अवकाश लेने की हकदार है.

कोर्ट का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को दो सप्ताह के भीतर निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल तबादले की सुविधा का नहीं, बल्कि एक मां और उसके बेटे की शिक्षा की जरूरतों का है.

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