नई दिल्ली: ईद मिलाद-उन-नबी, जिसे ईद-ए-मिलाद या मौलिद भी कहा जाता है, मुस्लिम समुदाय के लिए खास धार्मिक अवसर है. बता दें, यह दिन पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिवस की याद में मनाया जाता है. इस्लामी कैलेंडर के रबी-उल-अव्वल महीने की 12वीं तारीख को यह पर्व आता है. भारत में इस साल ईद मिलाद-उन-नबी 26 अगस्त यानी आज मनाई जा रही है, जबकि इससे जुड़े आयोजन 25 अगस्त से ही शुरू चुके हैं. वहीं इस परंपरा को मनाए जाने की पीछे क्या इतिहास और इसकी शुरूआत कहां से हुई थी चलिए जानते है.
मुस्लिम समुदाय में पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिवस को बेहद अहम माना जाता है. इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म 570 ईस्वी में रबी-उल-अव्वल महीने में हुआ था. उन्हें इस्लाम का अंतिम पैगंबर और ईश्वर का अंतिम संदेशवाहक माना जाता है. पैगंबर मुहम्मद ने अपने जीवन में इंसानियत, दया, माफी, बराबरी और जरूरतमंदों की मदद जैसे मूल्यों पर जोर दिया थी. वहीं उनकी शिक्षाओं और जीवन से जुड़ी बातें हदीस और अन्य इस्लामी परंपराओं में मिलती हैं. इसलिए मिलाद का दिन उनके जीवन और संदेशों को याद करने का अवसर भी माना जाता है.
ईद मिलाद-उन-नबी मनाने की परंपरा काफी पुरानी है. शुरुआत में इस मौके पर लोग एक जगह इकट्ठा होकर पैगंबर मुहम्मद के जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में चर्चा करते थे और उनके सम्मान में कविताएं और धार्मिक रचनाएं भी पढ़ी जाती थीं. इतिहास से जुड़े कई स्रोतों के मुताबिक, मिस्र में फातिमी खिलाफत के समय मौलिद से जुड़े आयोजनों को एक व्यापक रूप मिला और धीरे-धीरे यह परंपरा पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों तक पहुंची और फिर दुनिया के दूसरे देशों में भी मनाई जाने लगी.
ईद मिलाद-उन-नबी के मौके पर कई इलाकों में मस्जिदों, घरों और सड़कों को रंगीन रोशनी से सजाया जाता है. इसके साथ ही लोग धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और कुछ जगहों पर जुलूस भी निकाले जाते हैं. इस दौरान पैगंबर मुहम्मद के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर भी भाषण दिए जाते हैं. वहीं धार्मिक पाठ और कविताएं भी पढ़ी जाती हैं. कुल मिलाकर, यह दिन पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं को याद करने और प्रेम, भाईचारे, दया और इंसानियत के संदेश को आगे बढ़ाने का अवसर माना जाता है.