पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई लंबी अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में हुई बातचीत में दोनों पक्ष परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध राहत और हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे मुद्दों पर सहमत नहीं हो सके. इसके बाद भी अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने का हमला नहीं किया. बल्कि ट्रंप प्रशासन अब युद्ध को सीमित रखते हुए बाहर निकलने की रणनीति पर काम कर रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप शुरू में हमले से सब कुछ हासिल करने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन अब उन्हें नुकसान का अंदाजा हो चुका है.
इस्लामाबाद में वार्ता फेल होने के बाद अमेरिका ने ईरान को बड़ी धमकी दी थी, लेकिन हमला नहीं किया. ट्रंप ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस कर दिया है. उन्होंने घोषणा की कि हॉर्मुज से गुजरने वाले ईरानी जहाजों को रोका जाएगा. पहले अमेरिका हॉर्मुज को खुला रखने की बात कर रहा था, लेकिन अब खुद ब्लॉक करने की तैयारी दिखा रहा है. इसका मकसद ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना है ताकि दुनिया के अन्य देश इस मुद्दे पर अमेरिका से बात करें. ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करना चाहते हैं. इस रणनीति से वे बिना बड़े युद्ध के स्थिति को नियंत्रित रखना चाहते हैं.
ट्रंप अब पूर्ण शांति समझौते की बजाय मामले को होल्ड पर रखना चाहते हैं. ईरान यूरेनियम संवर्धन पर अपनी शर्तें नहीं छोड़ रहा है और 2015 वाले समझौते से कम किसी भी डील को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. अगर ट्रंप कमजोर समझौता करते हैं तो घरेलू स्तर पर उनकी आलोचना बढ़ सकती है. इस साल अमेरिका में मिडटर्म चुनाव भी आने वाले हैं. इसलिए वे जल्दबाजी नहीं करना चाहते. साथ ही खाड़ी देश अब खुद की सुरक्षा के इंतजाम कर रहे हैं. सऊदी अरब ने 13 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को बुलाया है. कुवैत, यूएई और कतर भी अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहे हैं.
अमेरिकी प्रशासन जानता है कि युद्ध को आगे बढ़ाने का मतलब सैनिकों को जमीन पर उतारना होगा. राष्ट्रपति ट्रंप इस बड़े रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं क्योंकि फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है. वाशिंगटन पोस्ट और द इकॉनोमिस्ट जैसी रिपोर्ट्स में भी यही संकेत हैं कि ट्रंप युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं. पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए उन्होंने खुद को जंग से अलग करने की कोशिश की है. अब वे चाहते हैं कि प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़े. मध्य पूर्व के देश सुरक्षा के नाम पर अमेरिका से हथियार खरीदें, यही उनका नया फोकस लग रहा है.
ट्रंप की यह रणनीति दिखाती है कि वे पूर्ण युद्ध के बजाय दबाव की राजनीति पर भरोसा कर रहे हैं. हॉर्मुज पर ब्लॉकेड से वे ईरान को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बड़े संघर्ष से बचना भी चाहते हैं. ईरान अभी भी मजबूती से अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है. अगर दोनों पक्ष लंबे समय तक बातचीत जारी रखते हैं तो कोई समझौता संभव हो सकता है, लेकिन फिलहाल स्थिति अनिश्चित बनी हुई है. यह घटनाक्रम मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति को एक बार फिर उजागर कर रहा है जहां कोई भी पक्ष आसानी से झुकने को तैयार नहीं है.