नई दिल्ली: उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच पहाड़ों पर जंगलों की आग ने तांडव मचाना शुरू कर दिया है. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सैकड़ों हेक्टेयर जंगल इस समय धू-धू कर जल रहे हैं. पर्यटकों के पसंदीदा शहर सोलन के कंडाघाट और क्यारीघाट के जंगलों से आई तस्वीरों ने हर किसी के रोंगटे खड़े कर दिए हैं.
पेड़ों से उठती आग
यहां चीड़ और अन्य पेड़ों से उठती आग की गगनचुंबी लपटें और सैकड़ों फीट ऊंचा काला धुआं दूर-दूर से दिखाई दे रहा है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाकों के आसपास की बस्तियों को एहतियातन खाली करवा लिया है. मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में बारिश का अलर्ट जारी किया है, जिससे इस बेकाबू आग पर काबू पाने की उम्मीद जगी है.
पहाड़ियों तक फैली आग
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के कंडाघाट से शुरू हुई यह आग अब तेजी से फैलते हुए क्यारीघाट के पूरे पहाड़ी इलाके को अपनी चपेट में ले चुकी है. फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, वन विभाग की टीमें और स्थानीय ग्रामीण मिलकर इस विकराल वनाग्नि को शांत करने की जद्दोजहद में जुटे हैं.
#WATCH | Solan, Himachal Pradesh | A massive forest fire stretches across the Kyarighat village area of Kandaghat. Residents and administrative officials are actively working to douse the fire. pic.twitter.com/ZDx9lCFjBu
— ANI (@ANI) May 26, 2026
इससे पहले कहां भड़की थी आग
इससे पहले इसी महीने छोटा शिमला में सचिवालय के पास एक दुकान से भड़की आग ने भारी तबाही मचाई थी. जिसे दमकल विभाग ने समय रहते रोका था. वर्तमान संकट को देखते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने आपदा प्रबंधन और अग्निशमन विभाग को राहत कार्यों में पूरी ताकत झोंकने और मुस्तैदी बरतने के कड़े निर्देश जारी किए हैं.
ग्लेशियरों पर मंडराया खतरा
पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के जंगलों की स्थिति भी बेहद नाजुक बनी हुई है. गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में आग 6 हजार फीट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी है. कुमाऊं और गढ़वाल के चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिलों में अब तक वनाग्नि की करीब 400 छोटी-बड़ी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं जिनमें 330 हेक्टेयर से अधिक वन संपदा जलकर खाक हो चुकी है.
नागरिकों को 1 लाख रुपये का इनाम
इस भयावह स्थिति को देखते हुए राज्य की भाजपा सरकार ने एक अनोखा कदम उठाया है. वनाग्नि को रोकने या आग बुझाने में मदद करने वाले सजग नागरिकों को 1 लाख रुपये तक का नकद इनाम देने की घोषणा की गई है। फिलहाल वन विभाग के 11 हजार से अधिक कर्मचारी मैदानी स्तर पर मुस्तैद हैं.
पर्यावरण को भारी नुकसान
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और चमोली जिलों में आग का रूप सबसे ज्यादा डरावना है. गढ़वाल रीजन में इस सीजन के तहत 25 मई तक 382 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं. जिसमें दुखद रूप से एक व्यक्ति की जान भी जा चुकी है. चिंता की बात यह है कि आग अब 'बांझ' के जंगलों तक पहुंच गई है.
पहाड़ों के दरकने का खतरा
बांझ के पेड़ पहाड़ों में मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और अपनी जड़ों में पानी रोककर भूमिगत जल व प्राकृतिक झरनों को रिचार्ज करते हैं. इन जंगलों के नष्ट होने से न सिर्फ पहाड़ों के दरकने का खतरा बढ़ गया है बल्कि उठते धुएं और कार्बन के कारण हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा भी दोगुना हो गया है.