जयपुर: यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को देश की सर्वोच्च अदालत से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आसाराम की उस याचिका पर राजस्थान सरकार से जवाब पेश किया है, जिसमें उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के सजा बरकरार रखने के फैसले को चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की सजा को निलंबित करने (सस्पेंड) से इनकार करते हुए साफ किया कि जमानत पर विचार केवल बेहद गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों में ही किया जा सकता है.
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. सुनवाई के दौरान बेंच ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, हम अभी जमानत नहीं दे रहे हैं. राज्य सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही हम इस बात पर विचार करेंगे कि क्या जमानत देने की कोई गंभीर आवश्यकता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में ही राहत दी जा सकती है जब याचिकाकर्ता की जान को कोई वास्तविक खतरा हो. इसके साथ ही कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आसाराम को जेल के भीतर ही उचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराई जाएं.
अदालत में आसाराम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल की उम्र 80 वर्ष से अधिक हो चुकी है. वह इस समय कई गंभीर शारीरिक बीमारियों से पीड़ित हैं, इसलिए उनकी सजा को निलंबित कर उन्हें राहत दी जानी चाहिए.
इससे पहले, 27 मई को राजस्थान हाई कोर्ट ने वर्ष 2013 के एक नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आसाराम की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था. हालांकि, हाई कोर्ट ने आसाराम को कुछ धाराओं में राहत भी दी थी.
हाई कोर्ट ने आसाराम को आईपीसी की धारा 376(D) (गैंगरेप), आपराधिक साजिश से जुड़ी धारा 120(B) और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(G)/6 के आरोपों से बरी कर दिया था. इसके अलावा सह-आरोपी संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को भी अदालत ने बरी कर दिया था.
अदालत ने नाबालिग से रेप से संबंधित आईपीसी की धारा 376(2)(F), धारा 376 और पॉक्सो की धारा 34 के तहत दोषसिद्धि को उचित माना. इसी वजह से उनकी उम्रकैद की सजा कायम रही.
इसके साथ ही आईपीसी की धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 370(4) (मानव तस्करी), 506 (आपराधिक धमकी), 509, 354(A) (यौन उत्पीड़न) और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 23 के तहत भी निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा गया.