नई दिल्ली: नेपाल ने भारत से खरीदारी करके लौटने वाले अपने नागरिकों पर शिकंजा कस दिया है। अब 100 नेपाली रुपये यानी करीब 62 भारतीय रुपये से ज्यादा का सामान लाने पर कस्टम ड्यूटी देनी होगी। सीमा चौकियों पर जांच इतनी कड़ी हो गई है कि छोटी खरीदारी के लिए भी घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। बालेन शाह की सरकार आने के बाद से बॉर्डर के उस पार बसे लोगों के लिए भारतीय बाजारों से सस्ता सामान लाना सपना बन गया है।
आपको बताते चलें कि सीमावर्ती इलाकों के नेपालियों के लिए भारत के बाजार पहली पसंद रहे हैं। वजह साफ है: कीमत में बड़ा फर्क। नेपाली रुपये भारतीय रुपये से कमजोर जरूर है, लेकिन नेपाल में सामान की कीमत आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
दूसरी तरफ, भारत के सीमावर्ती बाजारों में कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा का सामान काफी सस्ता मिलता है। वैरायटी और क्वालिटी भी बेहतर होती है। भारत का बाजार बड़ा है। यहां प्रतिस्पर्धा ज्यादा है, इसलिए चीजें कम दाम पर मिल जाती हैं।
वहीं इसके अलावा ओपन बॉर्डर पॉलिसी का फायदा उठाकर नेपाली लोग अब तक नमक से लेकर शादी के कपड़ों तक के लिए भारत पर निर्भर थे। यह उनके लिए सस्ता और आसान विकल्प था। अब यही विकल्प महंगा पड़ रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले नियमों में छूट थी। लोग 200 से 500 रुपये तक का घरेलू सामान बिना टैक्स ला सकते थे। अब हालात बदल गए हैं। कोई नेपाली नागरिक अगर भारत से सिर्फ 62 रुपये का सामान भी खरीदता है तो बॉर्डर पर 5% से 80% तक टैक्स देना पड़ रहा है।
इसे भंसार शुल्क कहा जाता है। यदि कोई शुल्क नहीं देता तो 24 घंटे के अंदर सामान जब्त कर लिया जाता है। सीमा पर सुरक्षा इतनी बढ़ा दी गई है कि लोग परेशान हैं। छोटी खरीदारी के लिए भी कागजी कार्रवाई और लंबी पूछताछ झेलनी पड़ रही है।
प्राप्त जानकारियों के मुताबिक भारत से सस्ता सामान आना बंद हुआ तो नेपाल के लोकल दुकानदारों ने दाम बढ़ा दिए हैं। अपने पास रखे स्टॉक को ऊंचे रेट पर बेच रहे हैं। इसका सीधा असर गरीब और कम कमाई वाले परिवारों पर पड़ रहा है। आशंका है कि इससे लोगों की बचत खत्म हो जाएगी। सीमावर्ती इलाकों में रहना महंगा हो जाएगा। रोजमर्रा की चीजों के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। कई परिवार पहले ही दिक्कत में हैं।
गौरतलब है कि इन तमाम घटनाक्रम के कारण सबसे बड़ी चिंता भारत और नेपाल के ऐतिहासिक रिश्तों को लेकर है। दोनों देशों के बीच 'रोटी-बेटी' का रिश्ता माना जाता है। बॉर्डर के दोनों तरफ शादियां होती हैं। व्यापारिक साझेदारी चलती है। लोग काम और रिश्तों के लिए आते जाते रहते हैं।
अब टैक्स और सख्त चेकिंग से लोगों का आना-जाना घट सकता है। सोचिए, यदि एक मामूली साड़ी या मिठाई का डिब्बा लाने पर भी भारी टैक्स और घंटों की चेकिंग झेलनी पड़े तो कौन बार-बार आएगा? सामाजिक रिश्ते बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।
काठमांडू में सत्ता परिवर्तन के बाद स्थानीय निकाय भी सख्त हुए हैं। नतीजा यह है कि सदियों से चले आ रहे रिश्तों पर अब ग्रहण लगता दिख रहा है। आम नेपाली के लिए भारत से झोला भरकर सामान लाना अब पुरानी बात हो गई है। जेब भी ढीली हो रही है और दिलों की दूरी भी बढ़ रही है।