नई दिल्ली: यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध अब पारंपरिक लड़ाई से आगे बढ़कर तकनीक आधारित संघर्ष में बदलता जा रहा है. युद्ध के मैदान में सैनिकों की सीधी मौजूदगी कम होती जा रही है और उनकी जगह ड्रोन, रोबोटिक वाहन तथा दूरस्थ नियंत्रण वाली प्रणालियां ले रही हैं. हालात ऐसे हैं कि कई सैन्य अभियानों में एक भी यूक्रेनी सैनिक जमीन पर उतरे बिना रूसी ठिकानों पर हमले किए जा रहे हैं.
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेनी सेना अब ऐसे रोबोट और ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है जिन्हें भोजन, पानी या आराम की जरूरत नहीं होती. कमांडर अब मोर्चे पर सैनिकों का नेतृत्व करने के बजाय स्क्रीन, लाइवस्ट्रीम और ड्रोन फीड के जरिए हमलों की निगरानी और संचालन कर रहे हैं. यह बदलाव युद्ध की प्रकृति को पूरी तरह बदलता हुआ दिखाई दे रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार, एक ही अभियान में विस्फोटकों से लैस कई रोबोटिक वाहन रूसी ठिकानों को निशाना बना सकते हैं. इन अभियानों के दौरान कोई भी यूक्रेनी सैनिक सीधे युद्ध क्षेत्र में मौजूद नहीं होता. ऊपर उड़ रहे टोही ड्रोन पूरे ऑपरेशन की निगरानी करते हैं, जबकि नियंत्रण केंद्रों में बैठे ऑपरेटर मशीनों को दूर से संचालित करते हैं.
लंबे समय से सैनिकों की कमी और पश्चिमी देशों के समर्थन को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच यूक्रेन ने मानवरहित प्रणालियों का उपयोग तेजी से बढ़ाया है. ड्रोन, रोबोटिक वाहन और रिमोट कंट्रोल हथियार प्लेटफॉर्म अब यूक्रेन की सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं. इन्हीं तकनीकों के जरिए यूक्रेन रूसी सेना के खिलाफ अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
अप्रैल में यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने दावा किया था कि यूक्रेनी सेना ने पहली बार केवल रोबोट और ड्रोन की मदद से एक रूसी ठिकाने पर कब्जा किया. उन्होंने यह भी कहा था कि वर्ष की शुरुआत से अब तक मानवरहित प्रणालियां 22,000 मिशन पूरे कर चुकी हैं.
यूक्रेनी सैनिकों के मुताबिक, पकड़े गए रूसी सैनिक इन रोबोटिक बम वाहकों को "मौन मृत्यु" कहकर पुकारते हैं. बताया जाता है कि ये मशीनें इतनी खामोशी से आगे बढ़ती हैं कि रूसी सैनिक अक्सर इनकी मौजूदगी का एहसास तब करते हैं जब वे विस्फोट क्षेत्र से महज 10 मीटर की दूरी पर पहुंच चुकी होती हैं.
पूर्वी यूक्रेन में पहले घर-घर जाकर लड़ाई लड़ चुके डिप्टी कमांडर बार ने कहा, "उस समय तो मैं ऐसी बात सोच भी नहीं सकता था. लेकिन मुझे एहसास है कि अगर उस समय ऐसे उपकरण उपलब्ध होते... तो मेरे और भी साथी बच जाते."
युद्ध में तकनीक की बढ़ती भूमिका पर उन्होंने कहा, "पहले युद्ध किसी न किसी रूप में अधिक मर्दाना होता था. वहां आपके कौशल मायने रखते थे - आपका प्रशिक्षण कितना अच्छा था, आप कितने अनुशासित थे, इत्यादि. अब तकनीक ही सब कुछ तय करती है. अब पीछे मुड़ना संभव नहीं है."
चार वर्षों से अधिक समय से जारी युद्ध के दौरान यूक्रेन को जनशक्ति के स्तर पर भारी नुकसान झेलना पड़ा है. कम आबादी वाले देश के लिए यह चुनौती और भी बड़ी बन गई है. इसी वजह से कीव प्रशासन ने ड्रोन उत्पादन बढ़ाने और मानवरहित प्रणालियों की क्षमता को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया है.
यूक्रेनी अधिकारियों का कहना है कि उनका लक्ष्य हर महीने लगभग 35,000 रूसी सैनिकों को हताहत करना है और इस वर्ष यह लक्ष्य हासिल भी किया गया है. इस रणनीति के जरिए यूक्रेन रूस पर अतिरिक्त दबाव बनाना चाहता है ताकि उसे अपनी शहरी आबादी और मध्यम वर्ग से अधिक सैनिकों की भर्ती करनी पड़े.
ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी GCHQ जीसीएचक्यू द्वारा बुधवार को जारी अनुमान के अनुसार, रूस के कुल सैन्य मृतकों की संख्या करीब 5 लाख तक पहुंच चुकी है.
जो तकनीक कभी युद्ध के मैदान में नई मानी जाती थी, वह अब यूक्रेन के सैन्य अभियानों का सामान्य हिस्सा बन चुकी है. घायल सैनिकों को सुरक्षित निकालने, अग्रिम मोर्चों तक रसद पहुंचाने और हमले करने जैसे कार्यों में रोबोटों का उपयोग बढ़ रहा है. यह बदलाव दिखाता है कि यूरोप के सबसे बड़े संघर्षों में से एक का स्वरूप कितनी तेजी से बदल रहा है.